Monday, July 4, 2016

गुरु, सद्गुरु और परमसद्गुरु का अनसुलझा रहस्य (हिंदी)

गुरु, सद्गुरु और परमसद्गुरु का अनसुलझा रहस्य


I am a Voice Without Form स्वामी विवेकानंद के इस वाक्य में एक गहन सत्यता है। आश्‍वासन है। व्यक्तिगत चेतनाका अंतिम अविष्कार याने ईश्‍वर। एक पत्थरभी ईश्‍वरत्व की राह पर है। भारत की आध्यात्मिक धारणा यही है की ईश्‍वर निर्माण कर्ता से ज्यादा इस अस्तित्व का आखिरी कलश है। मंदिर शिखर है! शायद इसी कराणसे मंदिर के शिखर दर्शन हम करते है ! बीजरुप वह ईश्‍वर कभी ना कभी खिलता है। मोगरे का फुल खिलता है ! इस अपरोक्षानुभूति के बाद उस सिद्ध के अस्तित्व की सुगंध फैलती है। इतरेतर सामान्यजन जो उस खिले हुए अस्तित्व के सान्निध्य में आतेही वह भी सुगंधीत हो जाते है। उस सामान्य जनको भी ईश्‍वर होने के लिए वह मदत करता है। ऐसा वह सद्गुरु तो प्रकट ईश्‍वर है।
    गुरु तीन प्रकार के है- पहला गुरु वह है जो विद्याकी आस जिसे है उसे विद्याका दान देता है। वह है विद्यागुरु या शिक्षक । वह तो केवल ज्ञान देता है पर अस्तित्व नही। वह तो मस्तिष्क में केंद्रीभूत होने को कहता है।
    ‘जो जानने से सब जाना जाता है क्या तुने वह सिखा है ? पिता उद्दालक गुरुकुल से शिक्षा लेकर घर वापस आनेवाले अपने पुत्र श्‍वेतकेतु को यह प्रश्‍न पुछता है। तब उसका उत्तर पाने के लिए फिरसे आश्रम आए अपने विद्यार्थी की जिज्ञासा सुनकर अज्ञान की एकही नाव में बैठे हुए वे विद्यागुरु श्‍वेतकेतु को केवल विधी बताते है। और मै वह नही जानता ऐसा प्रामाणिकतासे कहते भी है। और उसे जानने के लिए श्‍वेतकेतू जंगल में चला जाता है।
    ‘यह विद्या पढकर मै क्या करु? केवल पेट भरना सिखानेवाले इस ज्ञान से भी अधिक किंमती जो है वह मै जानना चाहता हूँ !’ ऐसा अपने बडे भाईसे, मै शाला क्यूँ नहि जाना चाहता इसका कारण बताने वाले गदाधर या रामकृष्ण परमहंस संसारी विद्याकी अपेक्षा अधिक महनीय ऐसा कुछ है यह जानते थे।
    विद्यार्थी ज्ञान की खोज करता है पर शिष्य रुपांतरण की !
    अधिक किंमती, जो जानने से सब जाना जाता है, वह सिखना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। वह सिखाने की जबाबदारी जो लेते है वह सद्गुरु है जो देह धारण किए हुए होते है।
    ‘हां ! मैने उसे देखा है ! जैसे मै तुझे देख रहा हूँ बिल्कुल वैसे ही ! फर्क इतना है की इससे भी ज्यादा सुस्पष्ट रुपसे! क्या तू उसे देखना चाहता है ?’ ऐसा आत्मविश्‍वासपूर्वक कहने वाला साधु नरेंद्रने इससे पूर्व कभी देखा नही था। और यह आत्मविश्‍वास सार्थ करानेवाला स्पर्श उसे उस गुरुने दिया था। जिससे उसका जीवन बदल गया। वह तो स्रोतापन्न हुआ ! निर्विकल्प समाधी के बाद नरेंद्रनाथ ने कहा की ‘उन्होने मुझे दिखलाया ! मैने मेरा ही चेहरा देखा।’ आगे वह भी उस सद्गुरुके स्थान पर कारुण्यभाव से बैठ गया। वह सद्गुरु थे रामकृष्ण परमहंस और वह शिष्य थे नरेंद्रनाथ याने स्वामी विवेकानंद।
    क्या आप हमे कुछ सिखा सकते है ? ऐसा एकने रमण महर्षी को पुछा तो उन्होने कहा, नहि ! मै तो जो सिखाया गया है उसे भुलाने को बताता हूँ। ऐसे सद्गुरु उस बालकवत समर्पित शिष्य को आत्मभान देने के लिए उत्सुक रहते है। उसने जमाया हुआ कुडा कचरा साफ करते है। उसे उसका ही चेहरा दिखाते है।
    ऐसे सद्गुरु अस्तित्व देते है ज्ञान नही। वह विकेंद्रित शिष्य को केंद्र की ओर ले जाते है। वे मस्तिष्क से जानकारी जडमूलसे उखाड फेकतें है। शिष्यके उस पौधे को कही और जगह पुनररोपीत करते है। कदाचित यह काम शुरु में बहुत पीडादायी होता है। वह उखाडना, रोपना, पत्तों का गिरना, मिट्टी में जडों का फिरसे जमना, यह सारा खेल प्रसव वेदनाओं जैसा होता है। फिर वह शिष्य बरगद की पेड जैसा फैलता है, उसका नया जनम होता है, वह द्वीज होता है।
    सॉक्रेटीस कहते थे मै तो दाई जैसा हूँ, और यह बात एकदम सही है, कारण सद्गुरु अहम की मृत्यु के बाद अस्तित्वका होश देनेवाले प्रसव काल में मदत करते है।
    पारस पत्थर लोहे को सोना बनाता है पर सोना लोहे को सोना नहि बनाता, पर सद्गुरु स्पर्श हुआ उपासक मात्र अनेक लोगोंका उद्धारकर्ता बन जाता है।
    पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात् ॥पातंजलयोग, समाधीपाद-26॥ अर्थात कालातीत होने के कारण वह गुरुका गुरु परमसद्गुरु है। सद्गुरु जब देह त्याग करते है तब उनका कालातीत अस्तित्व होता है। तब वे परमसद्गुरु होते है, ओंकारस्वरुप !  इस में भी कुछ कुछ फिरसे जगत के कल्याण के लिए आते है पर कुछ तो कभी नहि आते। उनका महापरिनिर्वाण होता है। दिया सदा के लिए बुझ जाता है। कृष्ण, बुद्ध, रामकृष्ण परमहंस, संत ज्ञानेश्‍वर, समर्थ, स्वामी विवेकानंद आदी फिरसे आते है । ‘मै दोसौ वर्ष बाद फिरसे आनेवाला हूँ !’ ऐसा रामकृष्ण ने नरेंद्रनाथ को कहा था ।
    देह में रहते हुए सद्गुरु जीवनमुक्त होते है, जागृत होते है, समय के अभाव का बोध रहता है। पर देह को मर्यादा होती है प्रकृती की भुक, प्यास, निद्रा आदी एक जैवीक घडी चलती रहती है। पर देह त्याग के बाद परमसद्गुरु अमर्याद रहते है। रामकृष्ण परमहंस के देहत्याग के बाद मां शारदा सौभाग्य अलंकार जो हात का कंगण निकाल रहि थी तब रामकृष्ण सशरीर प्रकट हुए कहने लगे,‘मैने तो केवल देह त्यागदी है। कंगन निकालने की आवश्यकता नहि है।’
    I am a Voice Without Form ऐसा जब स्वामी विवेकानंद कहते है तब ‘मै इस परमसद्गुरु के रुप में हूँ’, यही कह रहे है। वह तो अनेको बार हमारे लिए आए हुए है। ऐसी स्थिती में हम उनका जन्मदिवस या मृत्युतिथी कैसे मना सकते है ? किस जन्म की तिथी मनाएंगे ?
    कृष्ण अर्जुन को यहि बात समझा रहे है- बहुनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप॥5॥ अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्‍वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥6॥- हे अर्जुन ! मेरे और तेरे बहुत जन्म हुए है। तुझे नहि पर मुझे वह पता है। मै तो जन्मरहित और अविनाशी होकर भी सब प्राणीयोंका ईश्‍वर (परमसद्गुरु) हूँ। प्रकृती के स्वाधीन होकर अपने आपको अपनी योगमायासे प्रकट करता हूँ।
    योगी अरविंद स्वत: कहते है,‘अलिपुरके कारागृह में योगाभ्यास करते समय स्वामी विवेकानंद मुझे मार्गदर्शन करते थे।’ उन्होने उनके शरीरका त्याग किया हुआ है, फिर भी वे परमसद्गुरु योग्य और समर्पित उपासकको समय समय पर मार्गदर्शन करते रहते है।
    तिबेट में कैलाश पर्वत के पास एक ऐसी जगह है जहा पर हर साल वैशाखि पुर्णिमा पर याने जब बुद्ध निर्वाण को उपलब्ध हुए थे उस विशिष्ट समय पर पाचसौ बौद्ध सद्गुरु एकत्र आते है और उन्हे  मार्गदर्शन करने के लिए साक्षात बुद्ध प्रकट होते है।         साधनाकाल में स्वामी विवेकानंद को भी बुद्ध ने दर्शन दिए थे। सद्गुरु जब समय और अवकाश में विहार करते है तब भी उनका अदृश्य परमसद्गुरु के साथ संवाद चालु ही रहता है।
    किसी जनम में जिसे सद्गुरु मिले है उस उपासक को अगर समाधी लाभ नहि हुआ है और उसने देह छोड दी, फिरसे जन्म लिया तब भी उसे प्रत्येक जन्म में सूक्ष्म मार्गदर्शन मिलता रहता है। उसे पता हो या नहि हो। ऐसे सद्गुरु और परमसद्गुरु कि महत्ता का वर्णन करना मुझे संभव नहि है।
जय हरी ! 

लेखन सेवा - दामोदर प्र. रामदासी, पुणे

Saturday, July 2, 2016

प्रखर वैराग्य उदासीन ! (मराठी)

प्रखर वैराग्य उदासीन !
 

    शुभ हेच ज्याचं अचेतन मन असतं तो ऋषि. चेतन मन एक पट असेल तर नऊ पट मोठे अचेतन मन असते. जो मानवी मनाचा मोठा शक्तिशाली भाग आहे. अंतर्यात्रेला सुरुवात करण्यापूर्वी उपासकाला शरीर मनाचे ज्ञान आवश्यक आहे. अचेतन मनाची ठेवण बदलल्याशिवाय पुढची प्रगती अवघड आहे.
    जन्मजन्मांतरीचे बरे वाईट संस्कार, इच्छा साठवलेले हे मन- प्रमाण (कुठल्याही विषयाचे सम्यक ज्ञान), विपर्यय (मनाची संदेही नकारात्मक शक्ति), कल्पना, निद्रा, स्मृती या मनाच्या पाच शक्तिंचे अधिष्ठान असल्यामुळे ते जेव्हा पूर्णत: सकारात्मक (उत्साही व प्रसन्न) व ध्यानस्थ (अखंड अनुसंधान) असते अशा वेळी जागी होणारी सम्यक ज्ञानाची शक्ति अभ्युदय (प्रापंचिक उत्कर्ष) व नि:श्रेयस (पारमार्थिक सिद्धी) दोन्ही क्षेत्रात अडथळाविहीन यश देते. म्हणून स्वत: विषयी आदर किंबहुना सज्जन म्हणणं, उत्साही ठेवणं उपासकाला अपरिहार्य ठरतं.
    उत्साही कल्पना, सकारात्मक विचार यांची सततची पुनरावृत्ती अचेतन मनाची ठेवण बदलवून टाकते. मेंदूच्या पेशींवर होकारात्मकता कोरली जाते. व्यक्ति, विचार, भावना वा घटने कडे बघण्याची दोषदृष्टि वा निंदात्मक नकारात्मक अभिव्यक्ति बदलावीच लागते. मनाचा सतत वाहणारा प्रवाह, तिथे काही अशुभ आलं तर किंचीत थांबणं गरजेचं ठरतं तर व शुभं आलं तर त्यावर लगेच अंमलबजावणी करावी लागते. जसे राग आला तर आधी पाच दीर्घ श्‍वास घेतल्यास त्यावर नियंत्रण येतं. प्रेम जागं झालं तर विस्तार लगेच होऊ देणं इष्ट ठरतं.
    असे काम केल्यावर मग स्वप्नांचा ढंग बदलतो, निद्रेची गुणात्मकता वाढते, कल्पनेची भरारी उत्साहीत ठेवते. सुरुवातीच्या कठिण सरावानंतर ज्याप्रमाणे दुसरा विचार करत असतानाही ड्रायव्हर आपोआप गाडी पुढे चालवत ठेवतो. तसे उपासकाचे होते. तो उत्साहीच राहतो. अशा रितीने अचेतन सक्रिय होताच पुढची पायरी येते, अभ्यासाची !
    अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ गीता- 6.35 अंतर्यात्रेची सुरुवात अशी करताच पुढची पायरी येते ती अभ्यासाची (अखंड आंतरिक सराव). गीतेमध्ये भगवंत वैराग्या आधी अभ्यासाचे महत्त्व सांगतात. अभ्यास म्हणजे स्वभावाला अनुकुल असा एखादा विधी ज्या योगे आंतरिक जगतात प्रवेश करणं सोपं जातं. अंतर्मुखता वाढते. भक्तियोगी नाम-भजनाची साथ घेईल तर एखादा निर्गुणवादी अजपा वा संवेदनांचा आधार घेईल. कोणी आसन, मुद्रा, बंध लावीन तर कोणी कर्मालाच भगवंत मानीन.
    विषयसंगातून निर्माण होणारे गुणात्मक कार्य हेच विवेकाच्या शुद्ध वा अशुद्ध रुपास कारण होते अशावेळी स्वीकारले जाणारे रजतमात्मक विषय असतील तर विवेकाचा तोलही जाऊ शकतो म्हणून भगवंत वैराग्यासोबत विवेक न सांगता आधी अभ्यासाची अर्थात यौगिक क्रियाची जोड देतात. परि वैराग्याचेनि आधारे। जरि लाविलें अभ्यासाचिए मोहरें। तरि केतुलेनि एक अवसरे। स्थिरावेल॥ज्ञा.6.419 माऊली स्पष्ट करते. माऊलींना संसार शुन्यात नेण्यापेक्षा त्याला हरिप्रत्ययरुपी पूर्णानुभवाने जिंकावे हा वैराग्याचा परिणाम हवा आहे.
    प्रखर वैराग्य उदासीन। प्रत्ययाचे ब्रह्मज्ञान। स्नानसंध्या भगवद्भजन। पुण्यमार्ग॥ विवेक वैराग्य ते ऐसे। नुसते वैराग्य हेकांड पिसे। शब्दज्ञान येळिलसें। आपणचि वाटे॥ (दा.12.4.18-19) प्रखर वैराग्य मग प्रत्ययाचे ज्ञान तसेच भगवद्भजनाचा पुण्यप्रताप त्याने झालेला शुद्ध विवेक व वैराग्य उपासकाला पावन करु लागते. अन्यथा दिशाहिन झालेली दशा असेच म्हणावे लागते.
    म्हणून वैराग्य परिस्थिती निर्माण करते तर अखंड सराव वा अभ्यास म्हणजे त्या परिस्थितीत वापरायचे तंत्र आहे. प्रत्येक कृती म्हणजे आपल्या इच्छाच असतात. त्यांना थांबवण्यासाठी विवेक मित्रासारखी साथ करतो. तर्काच्या आधाराने वा मनाशी सतत संवाद साधुन प्रगल्भतेचा अत्युच्च स्तर म्हणजेच अचेतन मन घडवण्याचा महतपराक्रम विवेक करतो. वैराग्यानं निर्माण केलेली एक भावजन्य परिस्थिती का वापरायची याची प्रेरणा सतत विवेक देत राहतो. विवेक म्हणजे एक गजराचं घड्याळ असतं. पुन्हा पुन्हा साद घालणारे जुने संस्कार जागे झाले की ते उपासकाला जागं करतं. ‘इच्छा न करणं’ वा संकल्पविहिनता या अवस्थेला आणणं हे विवेकाचं कार्य असतं.
    माझा आनंद आता कशावरही अवलंबून नाही अशी भावस्थिती म्हणजे वैराग्य ! प्रपंचात उपासक व्यक्तिची, घटनेची, गोष्टीची निवड करु शकतो पण त्याचा विवेक व वैराग्य त्याला आसक्त होऊ देत नाही. निवड करा पण आसक्तिमध्ये पडु नका असा टकळा रात्रंदिवस चालु असतो. एखादा विधी, अभ्यासाचा मूळ गाभा स्वकेंद्रस्थ होणं आहे. जे काही घडेल त्यानं तत्काळ प्रभावित न होता स्वकेंद्रस्थ, तटस्थ, अनासक्त होऊन बघणं, मग निर्णय घेणं उचीत ठरतं. स्थिरवृतीचा चष्मा जगाचा यथार्थ आयाम दाखवतो.
    दीर्घकाळ, अखंड, अबाधीत सजगतेमुळे आपल्यात प्रतिष्ठापीत झालेली गोष्ट अभ्यास असते. ज्यात सादर सपर्मण अनुस्युत असते. मुळात सामरस्य-समसाम्य हाच अंतिम बोध असल्यामुळे संसार नष्ट करणं ही क्रिया नसुन संसार आत्मैव एतद् असा स्वसंवेद्यतेने अनुभवणे व ‘अवघाचि संसार सुखाचा करीन’ हाच इत्यर्थ आहे. शेवटी बालपणीच प्रौढता व प्रौढपणी बालता असा हा वैराग्यलक्षणेचा बोध आहे.
    जय हरि !

लेखनसेवा - दामोदर प्रकाश रामदासी, पुणे

विवेक, वैराग्य, अभ्यास ! (हिंदी)

विवेक, वैराग्य, अभ्यास !

    शुभ ही जिसका अचेतन मन है वही ऋषि है। चेतन मन एक टका तो नौ टका अचेतन मन होता है। जो मानवी मन का बडा शक्तिशाली भाग है। अंतर्यात्राको शुरुवात करने से पूर्व उपासक को शरीर-मन का ज्ञान आवश्यक है। अचेतन मन का रखरखाव बदलनेसे आगे की प्रगती आसान हो जाती है।
    जन्मजन्मांतर के बुरेभले संस्कार, इच्छांओं का भंडार यह मन- प्रमाण (किसी भी विषय का सम्यक ज्ञान), विपर्यय (मन की संदेही नकारात्मक शक्ति), कल्पना, निद्रा, स्मृती इस पाच शक्तिंयोंका अधिष्ठान है। जब वह पूर्णत: सकारात्मक (उत्साही एवं प्रसन्न) और ध्यानस्थ (अखंड अनुसंधान) होता है तब जगनेवाली सम्यक ज्ञान की शक्ति अभ्युदय (प्रापंचिक उत्कर्ष) एवं नि:श्रेयस (पारमार्थिक सिद्धी) दोनो क्षेत्र में बिना रुकावट यश देती है। इस कारण सुख के लिए सम्मान की भावना, उत्साही प्रवृत्ती उपासकको बनाए रखना अपरिहार्य होता है। उत्साह की कल्पना, सकारात्मक विचार इनकी सतत पुनरावृत्ती अचेतन मन को बदल देती है। मस्तिष्क पर होकारात्मकता चिन्हांकित होती है। व्यक्ति, विचार या घटना की ओर देखनेकी दोषदृष्टि वा निंदात्मक नकारात्मक अभिव्यक्ति बदल देनी आवश्यक हो जाती है। मन का सतत बहनेवाला प्रवाह, वहा कुछ अशुभ आया तो किंचीत ठहरना जरुरी है तो शुभं आया तो उस पर तुरंत अंमल करना जरुरी है। जैसे क्रोध आते ही पांच दीर्घ श्‍वास लेने से नियंत्रण में आता है , वह श्‍वास क्रोधको शांत करती है। अगर प्रेम जागृत होता है तो उसका तुरंत विस्तार होने देना इष्ट होता है। ऐसे करते करते अंतर्मन की स्थिती बदलती है।
    फिर स्वप्नोंका ढंग बदलता है, निद्राकी गुणात्मकता बढती है, कल्पनाकी उडान उत्साहीत बनाती है। शुरुवाती कठिण दौर बीतने के बाद जिस तरह दुसरा विचार करते हुए भी ड्रायव्हर अपनेआप गाडी चलाते रहता है उसी तरह उपासक उत्साहीच रहता है। ऐसे अचेतन मन सक्रिय होते ही अगली पायदान पर हम पहुंच जाते है, वह है, अभ्यास !
    अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ गीता- 6.35 अंतर्यात्रा की शुरुवात होते ही अभ्यास (अखंड आंतरिक सराव) शुरु हो जाता है। गीता में भगवंत वैराग्य के पहले अभ्यास का महत्त्व बतलाते है। अभ्यास याने स्वभाव को अनुकुल ऐसा एखाद विधी चुनना जिस के कारण आंतरिक जगत में प्रवेश करना आसान हो जाता है। अंतर्मुखता बढती है। भक्तियोगी नाम-भजन में नाचने लगता है तो कोई निर्गुणवादी अजपा या संवेदनाओंका आधार लेता है। कोई आसन, मुद्रा, बंध लगाता है तो कोई कर्म को ही भगवान कहता है।
    विषयसंगसे निर्माण होनेवाला गुणात्मक कार्य यही विवेक के शुद्ध या अशुद्ध रुप का कारण बनता है, उस समय स्वीकार करते रजतमात्मक विषयों के कारण विवेकका स्खलन हो सकता है। इस कारण भगवंत वैराग्य के साथ विवेक के बजाए अभ्यास अर्थात यौगिक क्रिया को बताते है। भगवान ज्ञानेश्‍वर माऊली को भी संसार शुन्य करने के बजाए उसे हरिप्रत्ययरुपी पूर्णानुभाव से जितना यही वैराग्य का परिणाम चाहिए।
    प्रखर वैराग्य, अनुभव का ज्ञान और भगवद्भजन का पुण्यप्रताप इससे शुद्ध हुआ विवेक फिर वैराग्य, उपासक को पावन करता है ऐसे सद्गुरु रामदासस्वामी कहते है अन्यथा दिशाहिन दशा ऐसा कहना उचीत होगा।
    इस कारण वैराग्य परिस्थिती को निर्माण करता है तो अखंड अभ्यास उस परिस्थिती में उपयोग करने का तंत्र है। प्रत्येक कृती इच्छांए होती है। इच्छाओं को समाप्त करने के लिए विवेक मित्र बन जाता है। तर्कके आधारपर, मन के साथ सतत संवाद साधके प्रगल्भताका अत्युच्च स्तर याने अचेतन मन बदलनेका महतपराक्रम विवेक करता है। वैराग्यसे निर्माण हुई एक भावजन्य परिस्थिती का उपयोग कैसे करे इसकी प्रेरणा सतत विवेक देता रहता है। विवेक याने म्हणजे एक आलाराम घडी है। पुराने संस्कार जगते ही वह उपासकको जगाता है। ‘इच्छा ना करना’ या संकल्पविहिनता इस अवस्था में उपासक को लाना विवेक का कार्य है।
    मेरा आनंद अब किसी पर भी निर्भर नही है ऐसी भावस्थिती याने वैराग्य ! संसार में उपासक व्यक्ति, घटना, कोई चीज चुन सकता है पर उसका विवेक और वैराग्य उसे आसक्त नही होने देते। चुनाव करो पर आसक्त ना हो। अनासक्त बनो ! ऐसे रात दिन स्मरण कराता रहता है। कोई विधी, अभ्यास का मूल स्वकेंद्रस्थ होना है। जो कुछ हो रहा है उससे तत्काल प्रभावित न होते हुए स्वकेंद्रस्थ, तटस्थ, अनासक्त होकर देखना, और फिर निर्णय लेना उचीत होता है। स्थिरवृत्तीका चष्मा जगत का यथार्थ दर्शन करवाता है।
     सादर सपर्मण के साथ निरंतर, सतत, अबाधीत सजगताके अभ्यास के कारण अपने में प्रतिष्ठीत हुई चीज ही अभ्यास है। सामरस्य-समसाम्य यही अंतिम बोध है, इस कारण संसार नष्ट करना यह क्रिया अपेक्षित नही है, संसार आत्मैव एतद् ऐसा अनुभव करना और उसे सुख पूर्वक करना ही ध्येय है। अंत में Be old, when young, that you may be young when you grow old. यही वैराग्य का बोध है।

    जय हरि ! 
लेखक - दामोदर प्रकाश रामदासी, पुणे

Wednesday, June 29, 2016

जो श्रद्धचेनि संभोगे। सुखिया जाहला ॥ (मराठी)

जो श्रद्धचेनि संभोगे। सुखिया जाहला ॥

    तर्काच्या वादळानंतर बुद्धी, चित्त एका दिशेने व दशेने अनुप्राणित होतात, पेशीपेशीतून भावधारेची गंगोत्री उगम पावते, धो धो वाहु लागते, अनंताच्या समुद्राच्या दिशेने. तीचं सुरुवातीचं अवखळ ओसंडून वाहणं, समाधीच्या मैदानी प्रदेशात गंभीरत्व धारण करतं. पात्र विस्तारतं. त्या गंगोत्रीचं सुरुवातीचं एकटीचं गाणं आता वैश्‍विक सूर होतो. अशी श्रद्धारुपी गंगा मलिनता घालवते. आरपार निरसपाणी सौंदर्य उधळते. ती निष्ठेसारखी रविवारच्या चेहर्‍यासारखी नसते. तिथे मुखवटे नसतात. म्हणून अंध ही श्रद्धा नसते तर अंध हा विश्‍वास असतो.
    निष्ठा बाह्यसंस्कारामुळे मिळते तर श्रद्धा आत जन्माला येते. मन लेकाचं मोठ्ठं तार्किक आहे, संदेह करतं, पुरावा मागतं. होय म्हणायलाही मुद्दे शोधतं आणि विश्‍वास ठेवतं. पण विश्‍वास व संदेह एकाच नाण्याच्या दोन बाजु आहेत. तर्क मात्र दोन्ही ठिकाणी केला जातो. श्रद्धा मात्र वेडेपणा असतो. ती एक व्यक्तिगत गहनतेत उमटलेली प्रतिती आहे. आई, बाप, समाज, संस्कृती, परंपरा यातून निष्ठा जन्माला येते. निष्ठा ही मृत श्रद्धा आहे. श्रद्धा ही जीवंत निष्ठा आहे !
    सर्व धर्म निष्ठेशी संबंधीत असतात पण धार्मिकतेचा संबंध केवळ श्रद्धेशी असतो. श्रद्धावान असणं म्हणजेच धार्मिक असणं.
    आस्तिकाची विश्‍वाला आलिंगन देणारी एक श्रद्धा असते तशी नास्तिकाचीही एक श्रद्धा असते. जगण्यासाठी मुळात श्रद्धा ही उपादान असते. ती प्रत्येकात असतेच. नाहीतर कोणी जगुच शकणार नाही. मग संदेही श्‍वास ही घेऊ शकणार नाही. पण तोही हवेवर श्रद्धा ठेऊन श्‍वास घेतोच. पूर्ण श्रद्धा परमजीवन ठरते, तर पूर्ण संदेह आत्महत्या !
    कधीतरी आकाशाला गवसणी घालता येईल या श्रद्धेने फांद्या वर उठतात, जीवनावरील त्या अनुकंपनीय श्रद्धेतूनच विकास संभवतो. श्रद्धावान सरळ असतो त्याची फसवणुकही होईल पण त्याला कोणी दु:खी करु शकत नाही. कारण तो अज्ञाताच्या वाटेवर निघालेला असुरक्षित जीवन जगणारा उपासक असतो. सुरक्षित निष्ठावान मानवी नियमांच्या कडीकोयंडांत स्वत:ला सुरक्षित करुन घेतात. बंदीस्त गुलाम. पण अनंताच्या अनिर्बंध स्वातंत्र्यात झोकला गेलेला श्रद्धावान वेडा पीर मोकळा असतो. हृदयाची कवाडं उघडी ठेऊन अस्तित्वाच्या प्रेमाचं स्वागत करतो. निष्ठा या मृत असतात हे समजतात तो गुलाम श्रद्धावान सम्राट बनतो. अमृत होतो !
    मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् । (गीता 8.7) माझ्या ठिकाणी मन-बुद्धी अर्पण केल्यामुळे तू नि:संशय मलाच मिळशील. हे सीमातीत अस्तिताचे आवाहन हृदय स्वीकारते. जन्मोजन्म मनबुद्धीने केलेल्या तर्काचे कधीतरी समर्पण होते. मग विठ्ठल भेटतो.
    कां वर्षाकाळी सरिता। जैसी चढो लागे पंडुसुता। तैसी नीच नवी भजतां। श्रद्धा दिसे॥(ज्ञा. 12-36) उन्हाळ्यात रोडावलेली सरिता पावसाळ्यात मात्र चांगलीच फुगु लागते. मेघही हातचं राखुन न ठेवता, सहस्त्रधारांनी सरितेला वर्षादान देतात. अगदी तसेच लडीवाळ भक्त बाळ श्रद्धेने माऊलीच्या पायाशी घुटमळतो ती माय लेकराला कडेवर घेते. भगवंतही त्या ढगांप्रमाणे पाझरतो. मग दोन्हीकडचे पाणी एकच होते. जे मेघात तेच सरितेत.
    जयांचा ईश्‍वरी जिव्हाळा। ते भोगिती स्वानंदसोहळा। जयांचा जनावेगळा। ठेवा आक्षै॥ (दा. 3-10-31) ही चढता वाढता भावोन्मत्तेत बुडालेला उन्मनी श्रद्धावान भक्त अमृताची चुळी मुखात धरतो. प्रेम पुष्ट होते, चित्त शुद्ध होते. तो प्राजक्ताचा भावसुगंधी सडा अंगणात पडतो. ईश्‍वरी जिव्हाळ्यातला स्वानंद सोहळामग्न भक्त गाऊ लागतो- रामदासी दर्शन जाले । आत्म्या विठ्ठलातें देखिले॥(स.गा.57)
    श्रद्धायुक्त हृदयात जे प्रतिबींब पडते. तेच त्याचे रुप होते. ज्याचे जया ध्यान। तेचि होय त्याचे मन॥(तुकाराम-3393). अशा श्रद्धेसाठी सुरुवात म्हणजे संदेहाचा ठावठिकाणा शोधुन काढून, बेगडी निष्ठा फेकून खरेखुरे प्रामाणिक संदेही बनुन मनाला तर्काच्या त्या सीमा रेषेवर आणुन ठेवणं, जिथे त्याचे विश्‍वास व संदेह मावळतील. कारण संदेह दु:खाशिवाय दुसरं काही देत नाही. पण त्या दु:खातुनच विकास संभवेल. श्रद्धा म्हणजे रुपांतरण, सार्‍या समाधीचा पाया श्रद्धा आहे असे पतंजलीही म्हणतात- श्रद्धावीर्यस्म्रतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्॥पांतजलसूत्र1.20
    मनातील सर्वात शक्तिमान तत्त्व म्हणजे श्रद्धा, तीच चित्कला ! भगवंताची. आत्मस्थ स्पंदनशील प्रेमकंप बाह्यत: श्रद्धेचे प्राकट्य ठरते. सत्याच्या प्रकाशाची जीवाच्या ठिकाणचे सुप्तत्व ती सचेत करते. मूळ प्रकट करणे हा कलेचा धर्म असतो म्हणून श्रद्धा ही ब्रह्मकला आहे ! मानवी जीवनात प्रकट होणारी निसर्गदत्त रम्यस्थळी जी बीजं असतात ती कलेने अभिवृद्ध पावतात त्या मागे श्रद्धा असते. तुका म्हणे झरा। आहे मुळीचाचि खरा॥तुकाराम 2662
    श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाऽधिगच्छति॥गीता4-39 इंद्रिय संयम असणार्‍या श्रद्धावान जीवाला ज्ञान प्राप्त होते, ते ज्ञान मिळतात तो शांती वा मोक्षास प्राप्त होतो. यात संयतेन्द्रिय: ची व्याख्या करताना आदी शंकराचार्य सूक्ष्म स्थिती सांगतात- श्रद्धावत्त्वेऽपि बहिर्मुखस्य ज्ञानं न सिद्ध्यत्यतस्तद्राहित्येन भवितव्यमित्याह संयतेन्द्रिय इति। अर्थात श्रद्धावान होण्याबरोबर अंतर्मुखता असेल तरच ज्ञान मिळते. तेव्हाच भक्ताचे श्रद्धेच्या द्वारातून चैतन्याच्या गाभार्‍यात प्रवेश होऊन शिवाचा परिचय होऊन तो ज्ञानवंत होतो. म्हणून ज्ञान हे भक्तिचे बालक आहे, पवित्र श्रद्धेच्या ईश्‍वरनिष्ठास ज्ञान सुखाने वरते असे माऊली म्हणते- यालागी सुमनु आणि शुद्धमति। जो अनिंदकु अनन्य गती। पै गा गौप्यही परी तयाप्रती। चावळिजे सुखे ॥ ज्ञा.9.40. या श्रद्धेला बाळसे आणते ती संतसंगती ! होईल माझी संती भाकिली करुणा। ते त्या नारायणा मनी बैसे॥ जाणीवमनापासून उतरत उतरत ही श्रद्धा परमजाणीवेत उतरते तेव्हा ती अविनाशी ठरते. सत्य व सरलता यांचा मिलाफ म्हणजे श्रद्धा ! ही प्राप्त होण्याला संतकृपाच लागते.
    जय हरी !
अक्षरसेवक लेखक- दामोदर प्रकाश रामदासी, पुणे.

Monday, June 27, 2016

संसार सफल हो गया ! (हिंदी)

वारी के निमित्त लेख माला

संसार सफल हो गया !

ज्ञान की यात्रा द्वैत तक, भक्ति की यात्रा आगे भी चल रही है, पालकीयाँ आगे जा रही है ! अनंत तक । मन तो द्वैत ही जानता है। लहर और सागर अलग जान पडती है पर होती नही। क्या वह सागर नही है ? भक्तिसूत्र है- युक्तौ च सम्परायात् । वियोग के पहले दोनो एकही थे। जैसे जन्म के पहले मा और बच्चा एकही होते है। वैसे भेद भी उपरका ही है। जब हम नही थे तब हम कहा थे ? यह प्रश्‍न भी मजेदार है।
    अनेको जन्मोंकी खोज किसी जन्म में ‘मै कौन हूँ ?’ इस परमप्रश्‍न के गहन विश्‍लेषण करने को हमे मजबूर करा देती है। और संभावना संभव लगने लगती है। पंढरपूर को निकले वारकरी की वारी अनेक जन्मों से हो रही है। जब तक भीतर के विठ्ठल के स्मरण आ जाए। उस अज्ञात के आश्‍वासित अनंत हात आधार देते समय स्मरण भी दिलाते है की ‘अरे ! मै ही मेरे गर्भ में था ! वह गर्भ तो उसी अनंत का है ! मै तो रोज होनेवाला परमात्मा ही तो हूँ !’ वारी में नाचते समय, भजन गाते समय या एकांत में मौन में किसी विलक्षण समय यह स्मरण किमती होता है। और फिर संसार दुख़मय ऐसी व्याख्या बदल जाती है।
    यह भक्त कैसा होता है- जैसे पारधी के हाथो छुटा पंछी आकाश में अपनी स्वतंत्रता में उडने लगता है। वैसा ही भक्त अपने अनेक दुखों से मुक्त और इच्छारहित होकर संसार में रहने लगता है। अंतर्यात्रा की वारी यह उस योगी की आनंदमय यात्रा ही होती है।
    संसार यह एक व्यथा है ऐसा नही लगता पर संसार में व्यथा है ऐसे अनुभव में आ जाता है। सुख का विस्तार ही संसार है यह प्रत्यय आता है। कारण वह उस शक्ति की ही अभिव्यक्ती है- शक्तित्वान्नानृत वेद्यम्- शक्ति एक क्रिया है। इस कारण जगत मिथ्या नही है। (भक्तिसूत्र) केवल चिद्विलास है !
    यह संसार है ऐसी व्याख्या मन करता है वह केवल वस्तुनिर्देश है, अपरिच्छिन्न ऐसा परमात्मा, उसके लीलारुप जगत से भ्रांतिकाल में जीवका जो संबंध आता है उसे ही संसार कहते है। भ्रांतीयाँ समाप्त होते ही जन्ममरण का स्वइच्छासे किया हुआ आवागमन भी स्वसुखमय होता है। तुका म्हणे गर्भवासी सुखे घालावे आम्हासी ! अर्थात हे भगवन् ! आप हमे गर्भवास दे सकते हो ! ऐसे उद्गार जगद्गुरु तुकाराम महाराज जैसे संतों के मुख से सहजता से निकलते है ।
    सुख तो मेरे बाहर है ऐसी भावनाही काम है ! ऐसा देहबुद्धीवाला जीव मै कर्ता के भावबंधन में जकड जाता है।  केंद्र के परीधी में सुख खोजने जाता है। उस के लिए तो संसार सुखदु:खमय सिद्ध होता है।
    उस वारकरी को, आज संसार सफल हुआ ऐसे लगने लगता है, कारण उसने विठ्ठल को पाया, उसे अपना ही साक्षात्कार हुआ, उस चिदानंदी मग्न पुरुष की माया छुटती है, चिद्रुप विस्तार का स्वरुप भ्रांती के विलक्षण माध्यम से प्रकट होता है तब उसे ‘माया’ कहते है। माया याने ‘मेय’ अर्थात जिसे नापा जा सकता है । पर जिसे नापा नही जा सकता उसका स्मरण संतत्व देता है।
    सद्गुरु कृपासे यह स्मरण आता है अन्यथा नियती और समय इनकी सत्तातले जीव को अनिच्छा से जन्म लेना पडता है। समय ही वासना है। समय वासना की ही निर्मिती है। वासनामय जीव को मृत्यु का डर सताता है। मृत्यु समय को रोक देता है। वासना  अभी बाकी है और मृत्यु सामने खडा है। जैसे ययाती अपने पुत्रोंसे उनकी आयु माँगता है फिर भी हजार साल जी कर भी वासनांए समाप्त नही होती, वासना दुष्पुर है। उसकी पुर्तता के लिए समय, भविष्यकाल चाहिए। कल की आशा पर हर एक ययाती अपनी जीवेषणा बचा रहा है। ‘अभी’ में रहना नही आता, पर वर्तमान में रहना आ गया तो इच्छा करना संभव नही होगा। वर्तमान को भी कौन पकड सकता है ? वर्तमान ऐसे कहने मात्र से उतना समय बीत गया, भूतकाल हुआ !
    वासनातीत होना ही कालातीत होना है। जिसे सुई नही है ऐसी घडी होना !  चेतना के पास समय नही है। चेतना को वासना का स्पर्श होता है और समय की निर्मिती होती है। अस्तित्व में समय नही है, शुद्ध चेतना याने अस्तित्वमय होना। इस पृथ्वी से मनुष्य गायब हो जाए तो समय की अवधारणा ही नही रहेगी।
    भ्रमीत जीव को जगतका होनेवाला अयथार्थ ज्ञान याने संसार ! बस यह भ्रांती मिट जानी चाहिए ! ऐसा निभ्रांत योगी फिर संसार में कितनाही क्यो न रहे वह नित्यमुक्त ही कहलाता है। आईने में वस्तु का प्रतिबींब दिखता है पर वह आईना साक्षी रहता है।  वस्तु से तदाकार नही होता। ऐसी ही संकल्प और व्याख्याओं से मुक्त वारकरी की स्थिती हो जाती है।
    केवल श्रीहरीका प्रेमरुप चिंतन ही भ्रांती मिटाने की दवा है। तृष्णा ही कृष्णा बनती है फिर सारे रंग एक हुए । अब सारे रंग मै हूँ। अब सत्य और मिथ्या किसे कहूँ। अब संतोने पालकीयाँ उठायी है, अनंत की वारी कभी समाप्त हो सकती है ? फिर नाचने और उत्सव मनाने के अलावा क्या हो सकता है ?
जय हरी !
अक्षरसेवा - दामोदर प्रकाश रामदासी, पुणे.

संसार सुफळ जाला गे माये ! (मराठी)

वारी निमित्ताने लेख माला

संसार सुफळ जाला गे माये !

    ज्ञानाची यात्रा द्वैतापर्यंतच, भक्तिची यात्रा पुढे सुरुच राहते ! दिंडी चालतच राहते ! मनाला द्वैत कळते. लाट व सागर वेगवेगळे वाटतात. पण उठलेली लाट सागरच नाही का ? भक्तिसूत्र आहे- युक्तौ च सम्परायात् । वियोगाच्या आधी दोन्ही एकच आहेत. जसं जन्माच्या आधी आई व बाळ एकच असतात, तसा भेदही वरवरचा आहे. जेव्हा आपण नव्हतो तेव्हा आपण कुठे होतो हा विचार किती गंमतीचा आहे.
    अनेक जन्मांचा आपला स्वत:चा शोध कुठल्यातरी जन्मात मी कोण ? या परमप्रश्‍नाचे गहन विश्‍लेषण करायला भाग पाडतो. आणि संभावना शक्य वाटायला लागतात. वारकर्‍याची वारी अनेक जन्मांपासून चालूच आहे. आतल्या विठ्ठलाचे स्मरण येईपर्यंत. त्या अज्ञाताचे आश्‍वासित अनंत हात सांभाळताना भानही देतात की मी माझ्या गर्भात मलाच बाळगुन होतो. किंबहुना तो गर्भ त्याच अनंताचा आहे. मी रोज होत जाणारा परमात्मा आहे ! वारीत नाचता नाचता, भजन गाताना, एकांतात मौनामध्ये कुठल्यातरी क्षणाला आलेलं हे भान किंमतीचं होतं, मग संसाराला दु:खमय म्हणून करत असलेली व्याख्या बदलून जाते. एकदम पिंजर्‍यातून मोकळं सुटल्यावर पक्ष्याला व्हावं तसं वाटायला लागतं.
    संसारव्यथे फिटला। जो नैराश्ये विनटला। व्याधा हातोनि सुटला। विहंगु जैसा॥ (ज्ञा.12-181) हा भक्त कसा असतो ! पारध्याच्या हातून सुटलेला पक्षी स्वैरपणे विहरतो, तसा हा भक्त संसारातील नाना क्लेश, नैराश्य, व्याधींपासून मुक्त होतो व इच्छारहित होऊन या संसारात विहरु लागतो. म्हणून अंतरयात्रेची वारी हा योग्याचा आनंदमय प्रवासच असतो !
    इथे ‘संसारव्यथा’ म्हणजे संसार हीच व्यथा असे नसून संसारात असलेली व्यथा अशी व्याख्या करावी लागते. तेव्हा सुखाचा विस्तार म्हणजे संसार असा प्रत्यय येतो. कारण तो त्या शक्तीचीच अभिव्यक्ति नव्हे का ? शक्तित्वान्नानृत वेद्यम्- शक्ति ही क्रिया आहे, यामुळे हे जग मिथ्या नाही. (भक्तिसूत्र) केवळ चिद्विलास !
    संसार म्हणून जी व्याख्या मन करते ती केवळ वस्तुनिर्देशाने आहे. अपरिच्छिन्न असा परमात्मा, त्याच्या लीलारुप जगताशी भ्रांतिकाळांत आलेला जीवाचा संबंध म्हणजे संसार. भ्रांती मिटताच जन्ममरणाचे स्वइच्छेने केलेले आवागमनही स्वसुखच असते.  तुका म्हणे गर्भवासी सुखे घालावे आम्हासी ! हे उद्गार तेव्हा निघतात.
    सुख हे माझ्या बाहेर आहे असं वाटणं म्हणजे काम ! असा देहबुद्धी असलेला जीव मी कर्ताच्या भावनेने जखडलेला, स्वकेंद्राबाहेर सुखाला शोधत फिरतो, त्याच्यासाठी संसार सुखदु:खमय ठरतो. जन्म विषयांची आवडी। जन्म दुराशेची बेडी। जन्म काळाची कांकडी। भक्षिताहे॥दासबोध, द.3, स.1, 9॥ असे नकारात्मक उद्गार निघु लागतात.
    ही भ्रांतीरुप स्थिती म्हणजे व्यथा ! पण चिदानंदी मग्न पुरुषाला ‘आजी संसार सुफळ झाला गे माये !’ असं वाटु लागते. कारण देखिएले पाय विठोबाचे ! विठोबाचे पाय बघणं म्हणजे स्वत:चं दर्शन होणं. पाहावे आपणासि आपण या नाव ज्ञान ! असं समर्थ म्हणतात. त्याची माया सुटते. चिद्रुप विस्ताराचे स्वरुप भ्रांतीच्या विलक्षण माध्यमातून प्रकट होते तेव्हा तीला ‘माया’ म्हणावे ! ‘माया’ अर्थात ‘मेय’ म्हणजे ज्याला मोजता येते अशी गोष्ट. पण जे फुटपट्टीत सापडत नाही त्याचं भान संतत्व देऊन जाते.
    जो भगवंताचा भक्त। तो जन्मापासून मुक्त। ज्ञानबळे विरक्त। सर्वकाळ॥(दा. दशक 3, स. 2, 52) हे भान यायला कृपाच हवी. अन्यथा नियती व काळ यांच्या सत्तेखाली जीवाला अनिच्छेने जन्म घ्यावा लागतो. काळ म्हणजेच वासना. काळ वासनेची निर्मिती आहे. वासनामय जीवाला मृत्युची भिती वाटते कारण मृत्युमुळे काळ थांबतो. वासना शिल्लक आहेत पण मृत्यु समोर आहे. ययाती आपल्या पुत्रांनाही त्यांचं आयुष्य मागतो तरी हजार वर्षात वासना संपत नाहीत. वासना पूर्तीसाठी वेळ, भविष्यकाळ पाहिजे. उद्याच्या आशेवर प्रत्येकातला ययाती जगणं चालु ठेवतो. ‘आत्ता’ आपल्याला राहता येत नाही, पण तसं झालं तर चालू क्षणात इच्छा करणं मुश्किल होतं कारण ‘आत्ता’ असा कितीसा आपल्या हाताने पकडता येतो ? तो ‘आत्ता’ म्हणेपर्यंत भूतकाळात जमा होतो.
    वासनातीत होणं म्हणजेच कालातीत होणं. काटे नसलेलं घड्याळ होणं. जाणीवेला वासनेचा स्पर्श झाला की काळ निर्माण होतो. अस्तित्वात काळ नसतो. शुद्ध जाणीव म्हणजे अस्तित्वमय होणं. पृथ्वीवरुन माणुस हरवला तर काळ संपून जाईल. संभ्रमित जीवाला जगाचे होणारे अयथार्थ ज्ञान म्हणजेच संसार. बस भ्रांती मिटायला हवी !
    असा निभ्रांत, विदेही झालेला पुरुष कितीही संसारी रमलेला दिसला तरी तो नित्यमुक्तच ठरतो. आरशात प्रतिबींबे उमटत राहावीत, परत परत नवीन उमटावीत पण आरशाला काही चिकटत नाही तशी दशा होते. विश्‍वामाजी अक्षर क्षरले साचार। त्या रुपा आधार पुससी काई॥ आपणचि विश्‍व आपणचि विश्‍वेश। जेथे द्वेषाद्वेष मावळले॥ (निवृत्ती 349) मग विश्‍व हेच विश्‍वेश, विश्‍वेश हाच विश्‍व ! द्वैताच्या व्याख्या संपल्या ! कारण त्या अक्षराचे आलेले स्मरण !
    मग संसार म्हणून काही वाटणे, जन्म मरण म्हणून केलेली स्वचेतनेची व्याख्या मावळते. अरे जे जालेचि नाही। त्याची वार्ता पुससी काई। (दास.8-3-1) केवळ श्रीहरीचे प्रेमरुप चिंतन हाच या भ्रांतीरुपाला उतारा. तृष्णा जेव्हा कृष्णा होते, भ्रांती निभ्रांतीत जाते तेव्हा अवघा रंग एक झाला ! मग सारे रंग माझेच ! आता सत्य-मिथ्या म्हणून कशाची व्याख्या करु ? संतांनी पालख्या उचलल्या, ही अनंताची वारी कधीतरी समाप्त होऊ शकते काय ? मग नाचणे व हरिपाठ गाण्याशिवाय पर्याय तो काय ? जय हरी !

वारी निमित्ताने अक्षर सेवा- दामोदर प्र. रामदासी, पुणे

Saturday, June 25, 2016

समाधी साधन संजीवन नाम ! (हिंदी)

समाधी साधन संजीवन नाम !

    समाधी साधन संजीवन नाम । शांति दया सम सर्वां भूती॥(ज्ञानेश्‍वर 400) पृथ्वी और वर्षा का सृजन उत्सव जो अनेक संभावनाओंको जनम देता है सृष्टी में हो रहा है उसी समय जीव शिव एकत्व का अभिनव आनंदोत्सव वारी (अनेक प्रांतोसे संतोंकी पालकीयाँ पंढरपूर की ओर निकलती है।) समारोह उपासक के अंतरंग और बहिर्रंग में उपसनाकी बहार लाता है। साधन और साध्यरुप संजीवन नाम परा में (उपासक के गती के अनुसार नाम परा, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी से आता है।) स्थिर होने के कारण  उपासक को साधनाका सार मिल जाता है। उपासना की नित्यनुतन यात्रा करनेवाला उपासक सद्गुरु कॄपासे केवल शांतिब्रह्म सिद्ध ही नही हो जाता पर उस अवस्थाका प्रसाद उसे मिलता है।
 ऐसा कारुण्यमूर्ती सिद्ध समत्वके अधिष्ठान में स्थिर हो जाता है।
    ओंकाररुपी नाम यह तो गौणी भक्तिकाही दर्शन है और गौणि भक्तीकी प्रेमोपासनासे समाधीकी गहनता में उपासक उतर जाता है।  गौण्या तु समाधिसिद्धी:॥ नाम तो भगवान के साक्षात्कारकी अपेक्षा ज्यादा उपकारक और सामर्थ्यशाली है।
    ज्ञानेश्‍वरी में भगवंत आश्‍वासित करते है,‘इस संसार में भक्तों का तारनहार मैं हूँ। मेरे ओर वह सहजतासे आ सके इसलिए मैने अनंत नामों से नौकाओं को बनाया है ताकी अकेले भक्त को भवसागर पार करने में धैर्य मिले । इस कारण मैने सहस्रावधी नौकाओं को बनाया है। जड, मूढ, अपंग ऐसे मेरे भक्तों को इस नाव में बिठाकर मैं उस पार ले जा रहा हूँ।
    वेदो मे प्रकट हुए सारे महावाक्यों का उद्घोष उस ओंकारस्वरुप हरी नाम के सामने गौण ही सिद्ध होता है। ऐसी गर्जना स्वयं ज्ञानेश्‍वर करते है।- तत्त्वमस्यादि वाक्यउपदेश। नामाचा अर्धांश नाही तेथे॥ (ज्ञानेश्‍वर 431)
    कर्मयोग-यज्ञयाग करने के लिए पुरोहित ब्राह्मण होना पडता है। उस के लिए भूमी, द्रव्य, कामनासिद्धी महत्त्वपूर्ण है, और तो और योग करने जाए तो तर्क का नर्क और चित्तभ्रष्ट होने का डर सताता है ! ज्ञानयुक्त मार्ग से चले तो साधनचतुष्टयसंपन्नता की आवश्यकता होती है और चित्त के दिनरात अखंड चलनेवाली क्रीया, मर्कटलीला छुटती नाही ऐसी हमारी अवस्था है। ऐसे में- कलियुगामाजि एक हरीनाम साचे। मुखे उच्चारीता पर्वत छेदी पापांचे॥ (1071) अर्थात कलियुग में हरी का नाम है जो पापों के ढेर, पर्वत नष्ट कर सकता है, ऐसा निश्‍चय संत एकनाथ महाराज देते है। अर्थात कलियुग तो कालसापेक्ष नहि है अपितु चित्तसापेक्ष स्थिती है।
    चिंतन आसनी शयनी। भोजनी आणि गमनागमनी। सर्वकाळ निजध्यानी। चिंतन रामकृष्णाचे॥(1153, एकनाथ) अर्थात चिंतन, आसन, शयन शय्यापर, भोजन करते समय, आते जाते सारे समय में निजध्यान में रामकृष्ण का ही चिंतन करे ऐसे संत एकनाथ महाराज बताते है। पर इस अनुसंधान में सूक्ष्मयुक्ती है।
    तस्य वाचक: प्रणव:॥ तज्जपस्तदर्थभावनम्॥ (पातंजलयोग 1.27,28) भगवान पंतजली नाम लेने की विधी समझाते हुए  उपासक को युक्ती देते है। वह ॐकार प्रणव ऐसा प्रसिद्ध है। ॐकार का जाप करो और उसपर ध्यान करो । केवल जाप करे यह बात नही कहते अपितु उसपर ध्यान लगाने केलिए कहते है।
    मनोविश्‍लेषक मन के तीन स्तर बताते है- जागृत बोध (Conscious), अर्ध-जागृत बोध (Un Conscious), अजागृत बोध (Sub Conscious) । पर चौथा स्तर जिसे परमबोध या परमजागृती (Super Conscious) कहते है उस बारे में मात्र हमारे ऋषी और संतही बताते है। सतत जागरुक या सजगतासे नाम लेने से प्रथम तीन अवस्थांओं की जानकारी उपासक को होती ही है और वह चौथे पायदान तक आ जाता है। स्वयं की जागृत स्थिती, निद्रा और स्वप्न को देखने की क्षमता उसे आ जाती है बाद में तुर्या यह चतुर्थ द्वार खुल जाता है। इस कारण जाप, ध्यान के बिना किया तो अर्धजागृती में वह पहुँच तो जाता हैे, अच्छी नींद भी आती है और वैसेही वह आगे बढता रहा, मंत्र जाप करता रहा तो अजागृत बोध में भी उतर जाता है फिर एक प्रकारकी मोहनिद्रा से वह ग्रसित हो जाएगा, पर यह तो ध्यान नही हो सकता।
    नाम का नाद इतना मधुर होता है की उस नाद में वैखरी, मध्यमा उलझ गयी है, सजग उपासक सारी संवेदनाओं के प्रती सजग है, ऐसे समय शरीर, मज्जासंस्था को वह नाद शिथील कर देता है पर उपासक को नही। वह जागृकता, वह ध्यान परमजागृती में उसे लेकर जाता है, पश्यंती में, परा में। वहा अनाहत प्रकट होता है। ध्याता, ध्येय की एकरुपता में विलक्षण संजीवन अवस्था है, परमजागृतीकी !
    अकेला उपासक नाम की नौका में उत्साहापूर्वक, ध्यानमय अर्थात सजगतासे आसनस्थ होता है तब मन के अलग अलग स्तर उस हरी नाम में रंग जाते है॥ अराजक मन, प्रक्षुब्ध चित्त, हतप्रभ प्रज्ञा एवं जडाश्रित अहंतासे चेतना अलग होने के कारण धर्मप्रकाश में वह उपासक नहा लेता है। यही उस नामधारक का सप्रेम ध्यान है। यह मधुकंपन आनंदके निरवय अवस्था की ओर, प्रासादीकता के स्तर तक जाकर सायुज्यमंदिर (सलोकता, समीपता, स्वरुपता और सायुज्यता ऐसी चारमुक्तियाँ है।) में भगवान से एक हो जाता है। सारा शरीर तटस्थ होकर भावसमाधी में निमग्न हो जाता है। फिर वैश्‍विक संवेदना प्राप्त हुआ वह उपासक अंत में गाता है की उस परब्रह्म विठ्ठल का चिंतन ही मैने किया है ।
    सावले विठ्ठल रुप दर्शन की चाह ने अष्टसात्त्विक भाव दशाप्राप्त सरल, सुशील, सद्धर्म्य, सानुरागकंपीत विरागी वारकरीकी चित्तदशा समाधीस्थ हो जाती है। वारी में नाचते, गाते समय शारीरमनोसंवेदनाओं के प्रती अतिसजग हुए अंतर्मुखी, ध्यानमय नामौपासक वारकरी शरीर से भुवैकुंठ पंढरपूर और चेतना के स्तर पर अपने भीतर का वैकुंठ सहजही पा लेता है , या ऐसे कह सकते है की भगवंतही नाम की नाव में उसे बिठाकर सहजतासे लेकर जाते है। उतरलो पार। सत्य झाला हा निर्धार॥ (तुकाराम 402) अर्थात अब भवसागर पार हो गया है और उस सत्यमय अवस्था का लाभी मैं हो गया हूँ ऐसे संत तुकाराम की तरह उपासक बोलता है। जय हरी !
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वारी के निमित्त अक्षरसेवा- दामोदर प्रकाश रामदासी, पुणे.
लेखक परिचय- सद्गुरु समर्थ रामदासस्वामी के पट्टशिष्य योगीराज कल्याणस्वामी शिष्यपरंपरा में नवगणराजुरी (जिला बीड, महाराष्ट्र) मठ के महंत, भारतीय आध्यात्मिक विचार दर्शन के व्याख्याता, प्रवचनकार है। आपका स्वामी विवेकानंदजी की जीवनीपर ‘योद्धा संन्यासी’ यह सोलो प्ले प्रसिद्ध है।
अधिक जानकारी के लिए - www.humanexcellencefoundation.in
नाटक की झलक देखने के लिए देखे-
https://www.youtube.com/watch?v=FzDnzHTc11k