Saturday, October 29, 2016

भगवान महावीर निर्वाण दिन (आश्‍विन अमावास्या) (हिंदी)

भगवान महावीर निर्वाण दिन (आश्‍विन अमावास्या)
    भारत में निर्माण हुए आध्यात्मिक विचार को सनातन धर्म या हिंदू धर्म कहते है। वैदिक, बौद्ध, जैन, सिख ऐसे अनेक पंथ उपपंथो ने इस आध्यात्मिक विचार को समृद्ध किया। दु:ख से मुक्ति या निर्वाण के लिए अनेक विधीयाँ दि। इस कार्य के लिए विशेष क्रांतीकारक चेतना अवतरीत हुई, जिन्होने इस अध्यात्मगंगा को लोकहृदय में उस काल की भाषा में प्रतिष्ठीत किया । ऐसी चेतनाओं में एक महान चेतना हुई भगवान महावीर !
    किसी समय में एकही पिता के दो पुत्रो में से एक राष्ट्ररक्षण के लिए शस्त्र उठानेवाला क्षत्रिय होता था तो दुसरा वेदमंत्र जाननेवाला ब्राह्मण । दु:खमुक्त करनेवाली विधी एवं पंथ (मार्ग) अलगअलग होते थे पर व्यक्तिको उसका अंतीम सत्य दिखलानेवाला, सनातनत्वका स्मरण करा देनेवाला, पुनर्जन्म-पूर्वजन्म सिद्धांतको माननेवाला, उपासना में ओंकारकी अनुभूति देनेवाला, कर्म सिद्धांत स्वीकार करनेवाला एकही सनातन धर्म था। सनपूर्व 15 वी सदी में कुरुपांचाल की भूमी में ब्राह्मण, क्षत्रिय ऐसा भेद शुरु हुआ था।
    भगवान श्रीकृष्ण के (जो जैनों के अगले कल्प में पहले तीर्थंकर होंगे) चचेरेभाई घोर अंगिरस (यदुकुल के श्रेष्ठ पुरुष दशार्ह-अग्रज समुद्रविजय इनकी रानी शिवादेवी इनके गर्भसे श्रावण शुक्ल पंचमीको जन्म) जिन्होने मुक्ति के लिए अहिंसावादी जैन पंथ का स्वीकार किया और केवलज्ञान प्राप्त करके भगवान नेमीनाथ इस नाम से 22 वे तीर्थंकर होकर प्रसिद्ध हुए। इसी बहाने यदुकुल में ब्राह्मण और श्रमण परंपराका मिलन हुआ ऐसा कहना अनुचित नही होगा । उनके बाद जैन परंपरा में सनपूर्व 599-527 के बीच में 24 वे तीर्थंकर भगवान वर्धमान महावीर हुए। जिनकी अश्‍विन अमावस्या यह तिथी (दिवालीका लक्ष्मीपुजनका दिन) महानिर्वाण दिन से पहचाना जाता है।
    बिहार राज्य में वैशालीके पास कुंडग्राम में (वसाढ) क्षत्रिय कुल में पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला इनके गर्भसे चैत्र शुद्ध त्रयोदशी को इनका जन्म हुआ। वैशाली महत्त्वपूर्ण गणराज्य था। मगध, कोसल, वत्स और अवंती इन विशाल गणराज्यों के समान वह बडा था। माँबाप ने वर्धमान नाम रख दिया तो वीरवृत्ती के कारण वे महावीर कहलाए। एक बार इंद्र उनके दर्शन के लिए आया था तब दर्शन लेते ही उन्हे वीर ऐसा कहा। तो चारणमुनीने सन्मती ऐसा कहा। संगमदेवने महावीर ऐसा नाम रखा। ज्ञातृपुत्र ऐसा और एक नाम भी उनका है।
    आयु के 30 साल में उन्होने गृहत्याग किया। ऋजुकूला नदी के तट पर जृंभक गाव में बारा साल कठोर तप करके उन्हे केवल ज्ञान हुआ। बाद में 66 दिन मगध देश में राजगृह के पास विपुलाचल पर्वतपर मौन धारण कर उन्होने विहार किया। वही इंद्रभूती नाम के ब्राह्मण की शंकाओंको दूर कर उसे पहला गणधर बनाया। इसके अलावा उनके अनेक मुख्य गणधर ब्राह्मणही थे । उनका ब्राह्मणधर्मकी जातीप्रथा एवं अनावश्यक क्रियाकांड छोडकर विरोध नही था ।
    भगवान बुद्ध के समकालीन भगवान महावीर ने मद्य, मांस, मदिरा, हिंसा, असत्यवचन, शहद, चोरी करना इन बातों को त्यागकर पत्नी के सिवाय परस्त्री को माता मानना और आवश्यक धन संग्रह बताया।
    व्यक्ती श्रेष्ठ होता है उसके कर्मसे जन्म से नही ऐसी स्पष्ट बात उन्होने कही। क्षत्रिय परिवार में जन्म लेकर भी ‘मै एक श्रेष्ठ ब्राह्मण हूँ’ ऐसा वे कहते थे। अध:पतित पुरोहित और उनके अनावश्यक जटिल क्रियाकांड इनको उन्होने विरोध किया । स्त्री, पुरुष और सभी वर्णों को मुक्ती का समान अधिकार है ऐसे वे कहते थे।
    य: शस्त्रवृत्ति: समरे रिपु: स्याद् य: कण्टको वा निजमण्डलस्य । अस्त्राणि तत्रैव नृपा: क्षिपन्ति न दीनकानीनशुभाशयेषु॥ अर्थात जो शस्त्रधारण कर के युद्धभूमी में युद्ध करने के लिए आया है या जो अपनी मातृभूमी को बाधा देने वाला हो ऐसे व्यक्तीपरही राजाओं को शस्त्र उठाना चाहिए। दीन, दु:खी और सद्विचारी पुरुषों पर नही। इसका अर्थ यह हुआ की उचित समय पर हिंसा का समर्थन उन्होने किया।
    अर्धमागधी भाषा के भगवतीसूत्र इस ग्रंथ में गुरुशिष्य संवाद से साधककों की अनेक शंकाओं का वे उत्तर देते है। साधनाद्वारा संकीर्णता छोडकर सर्वसंग्राहक स्तर को प्राप्त करने का अनुभव उनके अनेकांतवाद या स्यादवाद विचारो में दिखायी देता है। किसी भी चिजका चारो दिशाओं से विचार करनेका इशारा यहा मिलता है। अलग विचारोंके विरोधी पक्ष के बारे में समझदारी दिखानेका मानसिक धैर्य यहाँ अभिप्रेत आहे। स्याद्वाद से प्राप्त होनेवाला सम्यगज्ञान और अहिंसासे मिलनेवाला सम्यगदर्शन इन दोनोंका सार सम्यक चारित्र्य में प्रतिध्वनित होना चाहिए। हर किसीपर अपने अपने कर्म फलोंकी जवाबदेही होती है, इस कारण मोक्ष के लिए क्रियाक्षय करे और हर किसी को अपना उद्धार स्वयं को ही करना होगा, कोई परमेश्‍वर मोक्ष देनेवाला नही है ऐसा उन्होने कहा।
    मोक्ष का अधिकारी कौन ? अहिंसा, कर्म आदी उपदेशों को देखते हुए भगवान श्रीकृष्ण के गीता में दिए हुए क्रांतिकारी विचारोंकी याद आ जाती है । केवलज्ञान के बाद 42 वर्ष उन्होने श्रमणपंथ संघ निर्माण और प्रसार का कार्य किया और 72 साल की आयु में उनका अश्‍विन अमावस्या को निर्वाण हुआ।
    सो जयइ जस्स केवलणाणुज्जलदप्पणम्मि लोयालोयं । पुढ पदिबिंब दीसइ वियसिय सयवत्तगब्भगउरो वीरो ॥- जिसके केवलज्ञानरुपी उज्ज्वल दर्पण में लोक और अलोक प्रतिबींबीत समान विशद रुपसे दिखायी देते है और जो विकसित कमल पुष्प परागों के समान सुवर्णकांती से तेजोमय है, ऐसे भगवान महावीर का जयजयकार हो !
लेखन एवं संशोधन- दामोदर प्र. रामदासी

Saturday, October 1, 2016

संत ज्ञानेश्‍वर ने चामुंडा देवीको अर्पित किया बली ! (हिंदी)

संत ज्ञानेश्‍वर ने चामुंडा देवीको अर्पित किया बली !

क्या हम संतोने अनुप्राणित किए हुए मार्गपर चलनेवाले साधक है ? क्या हम भागवतधर्मरुपी भगवान को समर्पित है ? क्या हरीप्रेम से हमारा हृदय विभोर हो जाता है ? क्या हम भक्तिप्रेमरुपी सद्गुरुने बतलाए मार्गपर जा रहे है ? कुलस्वामीनीकी उपासना में क्या सचमुच हमारा नवरात्र धन्य हुआ है ? अगर इसका उत्तर हा है तो दशहरे के दिन माता के नाम अर्पीत होनेवाले बलीप्रथाको हम विरोध करे। संत ज्ञानेश्‍वर बलीका सत्य अर्थ समझाते है।
प्राणशक्तिचामुंडे । प्रहारूनि संकल्पमेंढे । मनोमहिषाचेनि मुंडे । दिधली बळी ॥ ज्ञानेश्‍वरी-12-53॥
    महावैष्णव ज्ञानेश्‍वर महाराज की उपासना यात्रा में किस भैंसे की और दुंबे की बली दि जाती है ? यह समझनेका हम प्रयास करेंगे ।
    संकल्प विकल्प रुपी दुंबा एवं मनरुपी भैंसा इनको प्राणशक्ति चामुंडा देवी को बली दिया है ! ऐसे संत ज्ञानेश्‍वर बता रहे है। ज्ञानदेव का ऐसा नवरात्री का समापन विलक्षण है । यह एक आंतरिक रहस्य है जिसमे मन-चित्त की बली देने की यह यौगीक पद्धती सद्गुरुकृपाके बिना असंभव है इसी कारण से एक मर्यादित स्तर की चिंतना ही यहा प्रकट करनेका प्रयास है।
     उपासना में जो सहज ही होनेवाला है उस विलक्षण घटना में शुरु से ही मन या चित्त को जुलुम जबरदस्तीसे दबानेका कारण नाही, इस यात्रा में सुक्ष्म स्थिती में जाते समय उपासना का संवेदनशिल नाजुक प्रांत शुरु हो जाता है। मन का या चित्त का क्रियासंभव यह केवल कुंडलिनी प्राणशक्तीके तेज का ही होता है। अपेक्षित मन मौनी और चित्त चैतन्य यह सद्गुरुकृपासे सहज ही घटीत होता है।
    अपनी गुरुपरंपरा बताते हुए ज्ञानेश्‍वर कहते है की आदिनाथ याने शिव जो सारे सिद्धों के गुरु है उनका मच्छिंद्र प्रमुख शिष्य है। मच्छिंद्रनाथ ने गोरक्षनाथ को बोध दिया और गोरक्षने गहीनीनाथ को । गहीनीनाथ ने निवृत्तीनाथपर कृपा की और निवृत्तीनाथ ने अपने छोटे भाई ज्ञानदेव को सार दिया। इस परंपराको देखकर कैवल्यरुप संत ज्ञानेश्‍वर पर नाथपंथीय हठयोगका प्रभाव है यह बात स्पष्ट हो जाती है ।
    हठयोग शक्तिवादी है। इसमे शक्ति और ज्ञान निष्ठा के साथ उपासक का जीवन समर्पित होता है। ज्ञान याने शिव और कुंडलिनी याने शक्ति। यह शिवशक्तिसामरस्यान्वित उपासना हठयोग मार्ग से फलद्रुप होती है। दुसरा कोई संप्रदाय जिस को चामुंडा ऐसा संबोधित नही करता उस कुंडलिनी शक्ति या प्राणशक्ति को ‘चामुंडे’ ऐसा कहकर उस अतिप्राचीन नाथपरंपराका ज्ञानेश्‍वर गौरवता पूर्ण उल्लेख करते है।
    चामुंडा यह अज्ञ लोगोंकी देवी है। अतिवेगवान विकार वायुसे त्रस्त होने से विगलितगात्र अवस्था जिन्हे प्राप्त हुई है, बंधन में फँसे होने के कारण आधिभौतिक, आधिदैविक एवं अध्यात्मिक दु:ख का अनुभव लेनेवाले किसीभी जीव को अज्ञ कहा गया है। ऐसे अज्ञ जीवोंके सारे बंधन तोडके उनका शिवत्व से मिलन करानेवाली यह चामुंडा ‘महदंबा’ है।
    चामुंडा याने तपस्विनी कुमारिका। जिसकी उपासना करके उपासक को शिवत्व का स्मरण आता है। नवरात्री में यह समर्पणका चितशक्तिविलास अपनेआप चलता रहता है। जो प्रारंभ में प्रकृतीवशात मै अनाथ हूँ, ऐसा अनर्गल बोलता रहता है वही जीव चामुंडा की कृपा से शिवत्व का स्मरण आते ही अपनेआप नाथ हो जाता है और औरोंको भी सनाथ करने का सामर्थ्य प्राप्त करता है।
    नाथपंथी बाहरसे शिव, भीतरसे शाक्त और समाज में वैष्णव होना चाहिए ऐसाही संदेश है। उस कारण वैष्णवता उसका हृदय, शिवता यह मस्तक तो शक्तियुक्त होना ही मन होता है। स्वभावत: वह शक्तिमय, योगनिष्ठ, जनहितकारी, आचारवान होता है। इसी कारण से वह ‘नाथ’ इस संज्ञाको पात्र हो जाता है।
    प्रारंभ में मन-चित्त की क्रिया जब मलीन होती है तब ‘नाथत्व’ अप्रकट रहता है। जीवकी यह अनाथ अवस्था होती है। वहा पशुवत चेतना प्रभावी होती है।उपासना की इस सहज यात्रा में उस संवेदनशील मोडपर वह मलीनता कुंडलिनी में लीन हो जाती है। यह सहज लीनता महत्त्वपूर्ण घटना सिद्ध होती है।
    मनोदोष याने संकल्प विकल्प है, चित्तदोष याने ‘असत’ पर श्रद्धाशील होना है। यह प्राणशक्ति जागृत होते ही यह दोष नष्ट होते है। अर्थात इन दोषों को ‘अर्पण’ करना ज्ञानदेव को अपेक्षित है, इसी कारण से ज्ञानदेव के नवरात्री में देवीका ठाट असामान्य है। यहा वे ‘वीरयोगी’ लक्षणा प्रकट कर रहे है। यह वीरयोगी चामुंडा भवानी को संकल्प विकल्परुपी बली अर्पित कर शिव हो जाता है।
    उसका नवरात्र जागर सिद्ध हो जाता है, वह अज्ञान का सिमोल्लंघन करके अनंत चैतन्य के प्रांगण में विजयोत्सव मनाता है। आगे भी उत्कट उपासनारुपी पुर्णिमा को कोजाग्रती ? प्रश्‍न पुछनेवाली शक्ती ऐसे ‘जागृत हुए’ नाथ को देखकर प्रसन्न हो जाती है। ज्ञानरुपी चंद्र के शितल प्रकाश में अमृतस्य पुत्र: ! इस भावमयी दुग्धामृत का प्राशन कर वह अमर हो जाता है। संत ज्ञानेश की परंपरा ऐसे नाथ - वैष्णव के प्रवेशसे धन्य हो जाती है ! ऐसे तापहीन मार्तंड का यह मस्त नृत्य, यह आनंदगान अस्तित्व में चलता रहता है।
    भवतारिणी चामुंडा के चरणो में प्रतिक्षण समर्पित भावमयता का यह अखंड जागर हम शुरु करे और अज्ञानरुपी भैंसा उसके चरणो में बली दे। जय चामुंडा भवानी !
लेखनसेवा- दामोदर प्र. रामदासी !

संत ज्ञानेश्‍वरांनी चामुंडा देवीला अर्पण केलेला बळी ! (मराठी)

संत ज्ञानेश्‍वरांनी चामुंडा देवीला अर्पण केलेला बळी !
काय आपण संतांनी अनुप्राणित केलेल्या मार्गाने जाणारे वारकरी आहोत ? काय आपण भागवतधर्मरुपी विठ्ठलाला समर्पित आहोत ? काय हरीप्रेमानं आपलं हृदय उन्मळुन येतं ? काय आपण भक्तिप्रेमरुपी सद्गुरुंनी दाखवलेल्या मार्गाने जाणारे आहोत ? कुलस्वामीनीच्या उपासनेमध्ये काय खरोखरंच आपले नवरात्र धन्य झाले असे वाटते आहे ? याचे उत्तर हो असेल तर दसर्‍याला देवाच्या नावाने अर्पण केला जाणार्‍या बळी प्रथेला आपण विरोध करु. ज्ञानेश्‍वर माऊलींनी बळीचा खरा अर्थ समजाऊन सांगितला आहे.
प्राणशक्तिचामुंडे । प्रहारूनि संकल्पमेंढे । मनोमहिषाचेनि मुंडे । दिधली बळी ॥ ज्ञानेश्‍वरी-12-53॥
    महावैष्णव ज्ञानेश्‍वर माऊलींच्या उपासना यात्रेत कुठल्या रेड्याचा व मेंढ्याचा बळी दिला जातो ? हे पहिल्याच माळेला आपल्याला कळले तर नवरात्रीच्या जागरणाला वा उपासनेला ते पूरक ठरु शकेल.
    संकल्प विकल्प हा मेंढा व मनरुपी रेडा यांना प्राणशक्ति चामुंडा देवीस बळी दिला आहे, असे संत ज्ञानेश्‍वर सांगतात. ज्ञानदेवांचे असे नवरात्र समापन विलक्षण आहे. हे खुप आंतरिक रहस्य आहे की ज्यात मन-चित्ताची बळी देण्याची ही यौगीक पद्धती सद्गुरुकृपेशिवाय असंभव आहे म्हणुनच एका मर्यादेपर्यंतच शब्दांचा वापर करण्याचे हे धाडस आहे.
    उपासनेत जे सहजच होणार आहे त्या विलक्षण घटनेत सुरुवातीपासुनच मनाला वा चित्ताला जुलुम जबरदस्तीने दाबण्याचे कारण नाही, या वाटचालीत सुक्ष्मामध्ये उतरत असताना उपासनेचा संवेदनशिल नाजुक भाग चालु होतो. मनाचा वा चित्ताचा क्रियासंभव हा केवळ कुंडलिनी प्राणशक्तीच्या तेजाचाच असतो. अपेक्षित मन मौनी व चित्त चैतन्य हे सद्गुरुकृपेने स्वभावेच घडुन येते.
    आदिनाथ गुरु सकळ सिद्धांचा। मच्छिंद्र तयाचा मुख्य शिष्य॥1॥ मच्छिंद्राने बोध गोरक्षासी केला। गोरक्ष बोलला गहीनीप्रती। गहीनीप्रसादे निवृत्ती दातार। ज्ञानदेवा सार चोजविले॥3॥ आपल्या गुरुपरंपरेचा उल्लेख करताना कैवल्यरुप माऊलींवर नाथपंथीय हठयोगाचा प्रभाव आहे हे स्पष्टच होते.   
    हठयोग शक्तिवादी आहे. यात शक्ति व ज्ञान निष्ठेने उपासकाचे जीवन समर्पित असते. ज्ञान म्हणजे शिव व कुंडलिनी म्हणजे शक्ति. ही शिवशक्तिसामरस्यान्वित उपासना हठयोग मार्गाने जाते. दुसरा कुठलाही संप्रदाय ज्यास चामुंडा संबोधित नाही त्या कुंडलिनीला, प्राणशक्तिला ‘चामुंडे’ संबोधुन त्या अतिप्राचीन नाथपरंपरेचा माऊली गौरवाने उल्लेख करतात.
    चामुंडा ही अज्ञ लोकांची देवी आहे. विकाराच्या वार्‍याने अतिशय फडफडल्यामुळे विगलितगात्र अवस्था प्राप्त झालेल्या, बंधनात अडकलेले असल्यामुळे आधिभौतिक, आधिदैविक व अध्यात्मिक दु:खाचा अनुभव घेणार्‍या कोणाही जीवाला अज्ञ म्हटले जाते. अशा अज्ञांची समस्त बंधने तोडुन त्यांची शिवत्वाशी गाठ भेट घडवून आणणारी ही चामुंडा ‘महदंबा’ आहे.
    चामुंडा म्हणजे तपस्विनी कुमारिका. जिची उपासना करुन उपासकाला शिवत्वाचे भान येते. नवरात्रात हा समर्पणाचा चितशक्तिविलास आपोआप चालु राहतो. जो प्रारंभी प्रकृतीवशात आपण अनाथ आहोत असे बरळत असतो तोच चामुंडेच्या कृपेने व शिवत्वाच्या भानाने आपोआप नाथ होतो व इतरांना सनाथ करण्याचे सामर्थ्य मिळवतो.
    नाथपंथी बाहेर शिव, आत शाक्त व समाजात वैष्णव असावा असा संदेशच आहे. त्यामुळे वैष्णवता हे त्याचे हृदय, शिवता हे मस्तक तर शक्तियुक्त असणे हे मन होते. साहजिकच तो शक्तिमय, योगनिष्ठ, जनहितकारी, आचारवान असतोच. म्हणुनच तो ‘नाथ’ या संज्ञेला पात्र ठरतो.
    प्रारंभी मन-चित्ताच्या क्रिया जेव्हा मलिन असतात तेव्हा ‘नाथत्व’ अप्रकट असते. जीवाची हीच अनाथ अवस्था असते. तिथे पशुवत चेतना प्रभावी ठरते. उपासनेच्या सहज यात्रेत ती संवेदनशील वळणावर कुंडलिनीत लीन होते. ही सहज लीनता महत्त्वाची घटना ठरते.
    मनोदोष म्हणजे संकल्प विकल्प होत, चित्तदोष म्हणजे ‘असत’ यावर श्रद्धाशील असणे होय. ही प्राणशक्ति जागृत होताच हे दोष नाहिसे होतात. अर्थात या दोषांचे ‘अर्पण’ करणे ज्ञानेशांना अपेक्षित असल्याने माऊलींच्या नवरात्रात देवीचा थाट असामान्य आहे. इथे ते ‘वीरयोगी’ लक्षणा प्रकट करतात. हा वीरयोगी चामुंडेला असा बळी अर्पण करुन शिव होतो.
    त्याचा नवरात्र जागर सिद्ध होतो, तो अज्ञतेचे सिमोल्लंघन करुन अनंत चैतन्याच्या प्रांगणात विजयोत्सव साजरा करतो. त्या पुढेही - उपासनेच्या उत्कट पोर्णिमेला कोजागरती ? विचारत येणारी शक्ती अशा ‘जागलेल्या’ नाथाला पाहुन प्रसन्न होते. ज्ञानरुपी चंद्राच्या शितल प्रकाशात अमृतस्य पुत्र: ! या भावमयतेचे दुग्धामृत प्राशन करुन तो संजीवन झालेला असतो. ज्ञानेशांची परंपराही या नाथ - वैष्णवाच्या अशा प्रवेशाने धन्य होते ! अशा तापहीन मार्तंडांचे धुंद वारी नृत्य, हे आनंदगान अस्तित्वात चालूच राहते.
    भवतारिणी चामुंडेच्या चरणी प्रतिक्षणाला समर्पित भावमयतेचा हा अखंड जागर आपण सुरु करुयात व अज्ञानाचा रेडा तिच्या चरणी बळी देऊयात. जय चामुंडा भवानी !
लेखनसेवा- दामोदर प्र. रामदासी !

Tuesday, August 23, 2016

सहजीया वैष्णव पंथ ! भाग 1 (हिंदी)

कृष्णजन्माष्टमी के निमित्त भावपुष्प

सहजीया वैष्णव पंथ !
भाग 1


    भगवान विष्णु कृपाका उत्सव कही भी शुरु हो सकता है; ऐसा संदर्भ ऋग्वेद में है। यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भागमनिमेषं विदथाभिस्वरन्ति। इनो विश्‍वस्य भुवनस्य गोपा: स मा धीर: पाकमत्रा विवेश॥ (ऋग्वेद 1.164.21) अर्थात अमृतका कुंभ जिसके  स्वाधीन है ऐसा परमात्म तत्त्व- महान आत्मा- जगत्स्वामी सर्वज्ञ ईश्‍वर मेरे जैसे अपक्व स्थिती के जिज्ञासु साधकजीवन में प्रवेश करता है; अर्थात किरणों में सूर्यप्रकाश जैसा सभी स्तरोंपर प्रवेश करता है वैसे ही यह परमात्मा साधकजीवन में स्वप्रकाश लेकर  अवतरीत होता है। तथापी यह कृपा साधक जीवन के शुरुआती समय की है, भगवान का यह रुप प्रभातसमय के सूर्यसमान जैसा है। जहा जिवात्मा प्रथम जागृत होता है। विष्णुमय जगत का भावोत्सव, समर्पणका गंगा तट तो अभी भविष्य के गर्भ में है। जहाँ यह अमृतकुंभ उलटा होगा।
    शरण्य प्रपत्तिदशा (चित्त की शरणमार्गीय दशा) उपासकको आरंभ में प्राप्त होती है, भगवान से शरण्य एकता होती है। स्व-तंत्रता कृष्ण तंत्रता हो जाती है। बालक को माँ गोदी में लेती है। वैसे ही सहजसाधना का कृपापंथ याने भक्तियोग भगवान ही घटीत करते है। ऐसे समय गोदी में मजे से बैठा हुआ बालक माँ को एकटक देखता रहता है। उस समय माँ के बारे में अनेकानेक विचारों से उसका मन भर जाता है।
    विराटका सिकुडना याने सगुण श्रीकृष्ण रुप और सगुण का अनंत विस्तार याने विराट। यहाँ भक्त प्रेम के कारण विराट सिकुडा हुआ है। वह पार्थसारथी भक्त को अभ्युदय और नि:श्रेयस के धर्ममार्ग पर ले जा रहा है। सगुण की लीला दिखाते समय उस परमसद्गुरुके अमृतशब्द पर किया हुआ ध्यान उपासकको प्रपंच और परमार्थ दोनो बातो में सिद्धी दिलाता है।
    उपासक की परिशुद्ध और निर्मल प्रज्ञा को भगवान के अनेक रुप दिखायी देते है। श्रीकृष्ण चेतना अध्यात्म की परम गहनताए और अभिव्यक्ति की अलौकीक उंचाइयाँ प्राप्त करते समय गंभीर रस की अपेक्षा आनंदरुपी अमृतसागर के उबाल धारण करती है जिसमें उपासक नखशिखांत भिग जाता है।
    मानवजाती के इतिहास में इतनी समग्रतासे और अनेक अंगों से जीवन को सहजता से स्वीकार करने वाली श्रीकृष्ण जैसी चेतना दुसरी नही हुई । सृष्टी ने दिए हुए सारे सुकोमल या नुकीली भावनांओं का सन्मान उसने बढाया। दुखी चित्त के काँटोंवाले जीवन को खिलने का सपना दिया। उदासीनता या दमन का निषेध करते समय - उन सारी भावनाओं में क्या मै नही बह रहा ? फिर तेरे सामने या तुझ में जो भी प्रकट हो रहा है उसका उत्सव मनाने के अलावा तेरे हातो में अब क्या रह जाता है ? इस प्रश्‍न से उस उपासक को जीवन का प्रसाद दिया ।
    उसने ‘अकारण आनंदीत हो’ का मंत्र दिया। फुल किस ध्येय से खिलता है ? वायु का ध्येय क्या है ? उत्तर है अकारण !
    शरीर के स्पंदन, बहनेवाली अनंत भावनांए इनका सहजस्वीकार कर ने को उसने बाध्य किया। इनसे लडने की अपेक्षा, रुपांतरण का मार्ग दिखाया। कारण वे शक्तियाँ अपनी ही तो है ! उनसे लडना याने एक हातने दुसरे हातसे लडने जैसा है ।
    विषयेभ्य: परावर्त्य स्थापनं स्वस्वगोलके। उभयेषामिन्द्रियाणाम् स दम: परिकीर्तित:॥विवेकचुडामणि-23॥ कर्म और ज्ञान इंद्रियों का प्रत्याहार अर्थात उन्हे अंतर्मुख करना, केंद्र की ओर वापसी याने दमन है ऐसे आदि शंकराचार्य कहते है। कुछ जीवोंको लगता है की दमन याने भावनाओं को दबाना, अरे यह तो भक्तिविरोधी है। सृष्टी ने दि हुई भावना विष्णुमय है। वह तो विष्णुकी ही कृपा है। तद्विष्णो: परमं पदम् सदा पश्यन्ति सूरय:। दिवीव चक्षुराततम्॥ (ऋग्वेद 1.22.20) इस व्यापक भगवान का साधकको पूर्ण सहयोग होता है। इसका ही उदात्त प्रकाशमान रुप साधकजन अंतराकाश में निहारते रहते है। उस कृपा के कारण वह साधक प्रकाशीत होता है।
    आंतरजगत विष्णुमय होने के बाद उस उपासकका स्वधर्मचक्रप्रवर्तन विविध स्तरों पर शुरु हो जाता है। सारे भेद नष्ट होते है। अनेकानेक जन्मों की अमंगलता समाप्त हो जाती है। उपासकको परिपूर्ण करने में विष्णुतत्त्व मदत करता है। इस कारण सारी भावनांए शरीरमन में एकरस में होती है। उनका कृष्णमय होना ही क्रांती का समय है। उस कृष्ण परमात्मा को आत्महिंसा या तथाकथित दमन कबुल नही है।
    तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् । मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥गीता11-33॥ हे सव्यसाची (बांए हाथ से बाण छोडने की क्षमतावाला) इस कारण तू उठ, यश प्राप्त कर। शत्रू को परास्त कर धनधान्यसंपन्न राज्य का भोग ले। यह सारे शूरवीर पहले ही मेरे हाथों से मारे गए है। तू बस निमित्तमात्र है !
    कृष्ण रस से रसमय हुआ ऐसा उपासक यह उपदेश पाकर पलायन नही करता। भक्ति का सामर्थ्य प्राप्त हुआ वह- अगर पुरुष हुआ तो स्त्री से भागता नही। अहिंसा और शांतीरुपी धर्मक्षेत्र से सिधे कुरुक्षेत्र के युद्ध में, हिंसा के दावनल में उतरनेकी हिंमत रखता है। बाहर अनंत संघर्ष आहे पर भीतर मात्र उसकी अनंत शांती भ्रष्ट नही होती।
    जीवनका समग्रतासे स्वीकार करनेवाली चेतना उपासक में निर्माण करना यही तो उसकी लीला का ध्येय है। फिर अमृत हाथ में आते ही उस उपासकको विष का क्या डर ? अहिंसा सिद्ध होते ही हिंसा का क्या भय ? और अगर वह अहिंसा हिंसा को डरती हो, तो उसे नपुंसकच कहना ही उचीत होगा । समस्त द्वंद्वों का एक साथ स्वीकार यही कृष्ण भक्ति है ! यही समर्पण है !
श्रीकृष्णार्पणमस्तु !
लेखनसेवा - दामोदर प्र. रामदासी

विष्णुमय जग ! वैष्णवांचा धर्म !! भाग 1 (मराठी)

कृष्णजन्माष्टमी च्या निमित्ताने लेखन भावपुष्प

विष्णुमय जग ! वैष्णवांचा धर्म !!
भाग 1

    भगवान विष्णु कृपेचा सोहळा कुठेही करु शकतात; असा उल्लेख ऋग्वेदांत आहे. यत्रा सुपर्णा अमृतस्य भागमनिमेषं विदथाभिस्वरन्ति। इनो विश्‍वस्य भुवनस्य गोपा: स मा धीर: पाकमत्रा विवेश॥ (ऋग्वेद 1.164.21) अर्थात अमृताचा कुंभ ज्याच्या स्वाधीन आहे ते परमात्म तत्त्व- महान आत्मा- जगत्स्वामी सर्वज्ञ ईश्‍वर माझ्यासारख्या अपक्व दशेतील जिज्ञासु साधकजीवनात प्रवेश करता झाला; अर्थात किरणांत सूर्यप्रकाश जसा सर्वत्वाने प्रवेशतो तसा हा परमात्मा साधकजीवनात स्वप्रकाशाने अवतरतो. तथापी ही कृपा साधकांच्या अपक्वकाळी आहे हे लक्षात ठेवावे. भगवंताचे हे रुप प्रभातकाळच्या सूर्यासारखे आहे. जिथे जिवात्मा प्रथम जागृत होतो. विष्णुमय जगताचा भावोत्सव, समर्पणाचा गंगा तट तर अजुन पुढेच आहे. जिथे हा अमृतकुंभ पालथा होईल.       
 पै आपुलेनि भेदेविण। माझे जाणिजे जे एकपण। तयाचि नांव शरण। मज येणें गा॥ ज्ञा. 18.1398॥
    शरण्य प्रपत्तिदशा (चित्ताची शरणमार्गीय दशा) उपासकास सुरुवातीस प्राप्त होते, भगवंताशी शरण्य एकता होते. स्व-तंत्रता कृष्ण तंत्रता होऊन जाते. आईने लेकराला कडेवर घ्यावे तसे सहजसाधनेचा कृपापंथ म्हणजे भक्तियोग भगवंत घडवून आणतात. अशावेळी कडेवर बसलेले लेकरु आईकडे मौजेने बघायला लागते. आईविषयीच्या अनेकानेक भावनांनी त्याचं चित्त भरुन जातं.
    विराटाचे संकर्षण म्हणजे सगुण श्रीकृष्ण तर सगुणाचे अनंत विस्तरण म्हणजे विराट. इथे भक्तप्रेमापोटी विराटाने संकर्षण केलेले आहे. तो पार्थसारथी भक्ताला अभ्युदय व नि:श्रेयसाच्या धर्ममार्गावरुन नेत आहे. सगुण प्रत्ययाची लीला दाखवताना त्या परमसद्गुरुच्या अमृतशब्दांवरील ध्यान उपासकाला प्रपंच व परमार्थ दोन्हीमध्ये सिद्धी दिल्याशिवाय राहत नाही.
    उपासकाच्या परिशुद्ध व प्रांजळप्रज्ञेला भगवंताची अनेक रुपे दिसतात. श्रीकृष्ण चेतना अध्यात्मातील परम गहनता व अभिव्यक्तिची अलौकीक उंची गाठतानाही गंभीर रसापेक्षा आनंदरुपी अमृतसागराचे रुप धारण करते जिच्या उकळ्या उपासकाला आचिंब भिजवून टाकतात
    मानवजातीच्या इतिहासात इतक्या समग्रतेने व चहुअंगाने जीवनाला सहजतेने स्वीकारणार्‍या श्रीकृष्णासारखी चेतना दुसरी झाली नाही. सृष्टीने दिलेल्या सर्व सुकोमल वा टोकदार अशा विविध भावनांचा सन्मान त्याने वाढवला. दु:खी चित्ताच्या काटेरी आयुष्याला उमलण्याचे स्वप्न दिले. उदासीनता वा दमनाचा निषेध करत - त्या सर्व भावनांतून मीच वाहत नाही का ? मग आता तुझ्यासमोर वा तुझ्यातुन जे प्रकट होईल त्याचा उत्सव साजरा करण्यापलिकडे तुझ्या हातात काय आहे ? या प्रश्‍नाने त्या उपासकाला जीवनाचे पसायदान दिले.
    त्याने ‘अकारण आनंदी व्हा’ चा मंत्र दिला. फुल कुठल्या ध्येयाने उमलते ? वार्‍याचे ध्येय काय ? उत्तर आहे अकारण !
    शरीराची स्पंदने, वाहणार्‍या अनंत भावना यांचा सहजस्वीकार स्वीकारायला तो भाग पाडतो. त्यांच्याशी लढण्यापेक्षा, दमनापेक्षा रुपांतराचा मार्ग दाखवतो. कारण त्या शक्ति आपल्याच आहेत. त्यांच्याशी लढणे म्हणजे एका हाताने दुसर्‍या हाताशी लढल्यासारखं आहे.
    विषयेभ्य: परावर्त्य स्थापनं स्वस्वगोलके। उभयेषामिन्द्रियाणाम् स दम: परिकीर्तित:॥विवेकचुडामणि-23॥ कर्म व ज्ञान इंद्रियांचा प्रत्याहार अर्थात त्यांना अंतर्मुख करणे म्हणजे दमन असे आदि शंकराचार्य सांगतात. काहिंना वाटणारे दमन (भावनांना दाबुन टाकणे असे समजणे) भक्तिविरोधी आहे. सृष्टी प्रदत्त भावना विष्णुमय आहेत किंबहुना विष्णुंचीच कृपा आहे. तद्विष्णो: परमं पदम् सदा पश्यन्ति सूरय:। दिवीव चक्षुराततम्॥ (ऋग्वेद 1.22.20) या व्यापक भगवंताचा साधकास पूर्ण सहयोग असतो. याचेच उदात्त प्रकाशमान रुप साधकजन अंतराकाशात न्याहाळतात, त्या कृपेने तो साधक प्रकाशतो.
    आंतरजगत विष्णुमय झाल्यावर त्या उपासकाचे स्वधर्मचक्रप्रवर्तन विविध स्तरांवर आत सुरु होते. सर्व भेद मावळतात. जन्मोजन्मीची अमंगलता मावळते. उपासकाला परिपूर्ण करण्यास विष्णुतत्त्व मदत करते. म्हणूनच त्या सर्व भावभावना शरीरमनांतून एकरस असतात. त्यांचं कृष्णमय होणं ही घटना क्रांती घडवून आणते. त्या कृष्णाला आत्महिंसा वा तथाकथित दमन मान्य नाही.
    तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् । मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥गीता11-33॥ हे सव्यसाची (डाव्या हातानेही बाण सोडु शकणारा) म्हणून तू ऊठ. यश मिळव. शत्रूंना जिंकून धनधान्यसंपन्न राज्याचा उपभोग घे. हे सर्व शूरवीर आधीच माझ्याकडून मारले गेले आहेत. तू फक्त निमित्तमात्र हो !
    कृष्ण रसाने रसमय झालेला असा उपासक हे ऐकून पलायन करत नाही. भक्तिचं सामर्थ्य लाभलेला तो- पुरुष असला तर स्त्री पासुन पलायन करत नाही, अहिंसा व शांतीस्वरुपाच्या धर्मक्षेत्रावरुन थेट कुरुक्षेत्रावरील युद्धात, हिंसेच्या दावनलात उतरायची छाती ठेवतो. बाहेर अनंत संघर्ष आहे पण आत मात्र त्याची अनंत शांती ढळत नाही.
    आयुष्याचा समग्र स्वीकार झालेली चेतना उपासकात जन्माला घालणं हेच तर त्याच्या लीलेचं ध्येय, मग अमृत हाती आल्यावर त्या उपासकाला विषाची काय भिती ? अहिंसा सिद्ध झाल्यावर हिंसेचे काय भय ? जर ती अहिंसा हिंसेला घाबरत असेल, तर तीला नपुंसकच म्हणायला हवी. समस्त द्वंद्वांचा एक साथ स्वीकार हीच कृष्ण भक्ति ! हेच समर्पण !
श्रीकृष्णार्पणमस्तु !
लेखनसेवा - दामोदर प्र. रामदासी

Friday, August 5, 2016

तरी मातेंचि गा पावसी। हे माझी भाक ॥ समर्पणाची कसोटी व कर्मसंन्यास (मराठी)

तरी मातेंचि गा पावसी। हे माझी भाक ॥
समर्पणाची कसोटी व कर्मसंन्यास (मराठी)

    आत्मदानाची दिव्यता म्हणजे समर्पण भाव. समर्पण म्हणजे भगवंताप्रति असलेली सर्वोच्च अविचल स्थिती. समृद्ध प्रगतियान. यतोऽअभ्युदय नि:श्रेयस सिद्धी स धर्म:॥ अभ्युदय अर्थात प्रापंचिक व नि:श्रेयस अर्थात पारमार्थिक सर्वोच्च लब्धता म्हणजे धर्म पण या पुरुषार्थासाठीही हवी पूर्ण समर्पणाची चित्तस्थिती. समर्पणाच्या भावना जीवनास लक्ष्याकार करतात. लक्ष्य व वेध घेणारा दोघांनाही दिव्यता देतात. हेच भगवंताप्रति असलेले भागवत आत्मनिवेदन वा अव्यभिचारी प्रेम होय. वेद ज्यास यज्ञ म्हणतात त्यास अध्यात्मात भक्ति म्हणतात, समर्पण शब्दात वरील सर्व भाव अनुस्युत होतात. अर्थात यज्ञ प्रवृत्तीत अभिलाषा डोकावते हा विचार अलाहिदा ! जे भक्तिंत वा समर्पणात नसते.
    मय्यर्पित मनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥गीता 8.7॥- अर्थात माझ्याच ठिकाणी मन व बुद्धी अर्पिली आहेत असा तू मलाच प्राप्त होशील यात संशय नाही.
    तू मन बुद्धि साचेसीं। जरी माझिया स्वरूपी अर्पिसी। तरी मातेंचि गा पावसी। हे माझी भाक॥- माऊली म्हणते- हे अर्जुना, तू मन आणि बुद्धी ही खरोखर माझ्या स्वरुपात अर्पण करशील तर मग माझेच रुप होशील हे प्रतिज्ञापूर्वक तुला मी सांगतो.
    यात भगवंताने वापरलेला प्रतिज्ञापूर्वक हा शब्द सृष्टीचा सनातन नियम आहे. सिद्धांतरुप आहे. त्यामुळे या समर्पित होण्याच्या भावदशेला आपोआपच महनीयत्व प्राप्त होते.
    यत्करोषि यदश्‍नाचि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥ गीता 9.27॥ अर्थात घडणार्‍या प्रत्येक क्रियेत ईश्‍वरार्थ धारणा ठेवणे हा समर्पणाचा प्रथम पाठ होतो. कारण ज्याप्रति समर्पित व्हायचे ती गोष्टही व्यापक व पूर्ण हवी. अपुर्‍या पदार्थांप्रति समर्पित होणे म्हणजे तसेच गुणसमुच्चय समर्पित होणार्‍या चित्तात प्रकट झाले म्हणून समजावे.
    म्हणून समर्पित होताना काय चित्त दशा हवी ? तर 1) जसा मी देवास हवा होतो तसेच त्याने मला घडवले व तेवढेच त्याने मला दिले 2) जे दिले तेही त्याच्यासाठीच व त्याने माझे सामर्थ्य पाहुन मला दिले, ते देणे किती असावे हे मी ठरवु नये वा तशी वासना करु नये व दिलेले ते मी त्याच्यासाठीच वापरायचे आहे. 3) जसा फुलास सुगंध, वार्‍यात वाहणे दिले तसे. तेव्हा त्या फुलाने वारा होणे वा वार्‍याने फुल होण्याचा हट्ट करु नये. कारण तसा हट्ट हा त्या देवाने जे दिले त्याप्रति अप्रसन्न होण्यासारखे आहे अशा चित्तात समर्पण ढासळले असे समजावे. आपापल्या दिलेल्या शक्तिने समर्पित होणे हेच प्रसन्नतेचे रहस्य आहे.
    4) म्हणून स्वत:प्रति अज्ञानाचा वा कमीपणाचा वा अपराधीवृत्तीचा गंड हा पारमार्थिक गुन्हा आहे. कर्मवृत्तिचा त्याग वा निवृत्ती हे ढोंग होऊन बसते कारण तसे करणे म्हणजे देवाने जे माझ्यासाठी नेमून दिले त्याप्रति नाखुष असणे आहे वा त्या कर्मांच्या माध्यमातून देवाला माझा समर्पणाचा भाव हवा होता त्याला मीच खोडा घातल्यासारखा होईल. म्हणून जे माझ्याकडुन कर्म होते आहे ते माझ्यामार्फत तोच करतो आहे व ते त्यालाच समर्पित होते आहे हा भावच ईशपूजा आहे. 5) म्हणुन त्या सर्व कर्मांच्या बाबतीत अखंड प्रसन्नभाव व उत्साह हा चित्ताच्या ठिकाणी चोवीस तास राहिला असेल तर देव माझ्यावर खुश आहे असे समजावे.
    बाह्य कर्मांबरोबर मन (संकल्प व भोग), चित्त (आस्था), बुद्धी (स्मृति व गति) व अहंकार (अभिमान व अस्मिता) या सर्व अंतरीय शक्ति ईश्‍वरार्थ वापरणे हे स्वाभाविकच आले.
    ठेविले अनंते तैसेचि राहावे। चित्ती असु द्यावे समाधान ॥तुकाराम॥ यात ठेविले या संकल्पनेतील गहनता चिंतनीय होऊन जाते.
    जगाच्या खेळात नेमून दिलेले काम इतरांच्या सहयोगाने करावे लागते तेव्हा एखाद्याने त्या खेळात ते काम टाळले तर खेळातील आनंद संपून जातो. त्यांना आनंदही हवा आहे पण कामही नको आहे. असे खेळाडु खेळ मोडतात वा खेळ टाकुन वेगळे होतात. या जीवांना तथाकथित कर्मसंन्यासी जाणावे. यांना आनंदाची वासना आहे पण खेळ नकोय. एक प्रकारे देवनिर्मित खेळातील हा अपराधी ठरतो कारण त्या खेळाला त्याने खोटे मानलेले असते.
    माऊली देह असे पर्यंत कर्मत्याग अशक्य आहे असे ठणकाऊन सांगतात- तैसा शरीराचेनि आभासे। नांदतु जव असे। तव कर्मत्यागाचे पिसे। काइसे तरी॥ज्ञा.18.222॥ व या पाच कारणांमुळे कर्म घडते असे ते सांगतात- 1) देह- तैसी यथा लक्षणे। आइके कर्मकारणे। तरी देह हे मी म्हणे। पहिले एथ॥18.315॥, 2) कर्ताजीव- आणि कर्ता हे दुजे। कर्माचे कारण जाणिजे। प्रतिबिंब म्हणिजे। चैतन्याचे जे ॥18.321॥, विभिन्नइंद्रिये- ते पृथक्विधकरण। कर्माचे इया कारण। तिसरे गा जाण। नृपनंदना॥18.331॥, कर्तृत्वशक्ति- तैसी क्रियाशक्ति पवनी। असे जे अनपायिनी। ते पडिली नानास्थानी। नाना होय॥ ते भेदिली वृत्तिपंथे। वायुशक्ति गा एथे। कर्मकारण चौथे। ऐसे जाण॥18.333/343॥ व दैव-देवांचा समुदाय- ते देववृंद बरवे। कर्मकारण पांचवे। अर्जुना एथ जाणावे। देवो म्हणे॥18.351॥. कर्मसंन्यास तोच ज्यात अहंकार रहित ईश्‍वरार्पण वा सद्गुरुर्पण भाव आहे.
    अहं-बुद्धि-चित्ताप्रति नकारात्मक भाव सोडुन त्यांना ईश्‍वराप्रती जडवुन ठेवणे व जे जे माझ्याकडुन होईल ते सर्व त्यास अर्पण आहे हा भावच कर्मसंन्यास होय. परि तोचि संन्यासु वीरा। करणीयेचा झणे करा। आत्मविवेकु धरा। चित्तवृत्ति हे॥ज्ञा.18.1261॥ ऐसे चैत्य जाते सांडिले। चित्त माझ्या ठायी जडले। ठाके तैसे वहिले। सर्वथा करी॥ज्ञा.18.1268॥
    स्वामी विवेकानंद म्हणतात हे जग म्हणजे एक शाळेच्या खेळाचं मैदान आहे व आपण शाळकरी पोरं त्या मैदानावर खेळण्यासाठी सोडलेली आहोत. ही बुद्धी आल्यावर या जगात हसण्याशिवाय, खेळाडुवृत्तीशिवाय काही शिल्लक राहत नाही. असं असताना आपल्यातून खेळणाराही तोच, खेळही तोच होतो. त्यामुळे धरुन ठेवावं असं काही राहत नाही. हा खेळच चिद्विलास आहे.
    भोगविषयांवरील आसक्तिभावनेपेक्षा प्रेमाची भावना महत्त्वाची. भोगही तोच. अहं भावनेप्रति अपराधभाव धरण्यापेक्षा त्याला व्यापक स्वरुप देणं अगत्याच होतं. लोभही त्याचा, दंभही तोच, मोहातला मोहनही तोच अशावेळी षड्विकार ही विकाराची भावना जाऊन षडभावयुक्त असा मी तोच आहे असे व्यापकत्व येते. या धारणेमुळे आत्मगंडयुक्त चित्ताची विपन्नावस्था नाहीशी होते. ईश्‍वरीय प्रेमाची अद्वितीय भावनाच ऋजुता आहे ! ती प्रकट होते. त्या व्यापक अहंतेमध्ये त्या भगवंताचे अवतरण होते.
    भक्तिगंगेच्या तिरावर आलेला शरणागत उपासक सद्गुरुंच्या साक्षीने त्या गंगेच्या प्रवाहावाबरोबर स्वत:ला सोडून देतो. या समर्पणाला बुद्ध स्रोतापन्न होणं म्हणतात. अर्थात हे समुद्राच्या आकांक्षेने नसते तर ते वाहणंच लक्ष असते. आता कुठे पोहोचण्यासाठी हे तरंगत वाहणे नसते.
    शरणागत भाव मंदिराचा अत्युच्च कळस म्हणजे समर्पणता ! अर्थात त्यात समत्व भावनेने अर्पण होणे हा भाव अंतर्भुत असतोच. आता सुखदु:खाच्या भावनीक आवाहनाला उपासक भगवंताप्रति समर्पित करत राहतो. कारण योगभ्रष्टतेची आत्मपीडा त्याला मिटवायची असते. त्याची ही भोगभावनेप्रति उपेक्षा शुष्क नसते तर समर्पित असल्याने उत्साहमय असते. ऐलतीरावरील भोगमय अभ्युदयाचा सुखसोहळा अनुभवल्यावर आलेला तो वीतराग असतो. त्याला पैलतीरावरचा अकारण आनंदसोहळ्याचा वैकुंठ खुणावत असतो. त्याला त्या भोगाविषयी आसक्तीही नसते वा क्रोधही नसतो, यालाच कृष्ण अनासक्त योग म्हणतात.
    त्या उपासकाचे अंधाराशी भांडण मिटलेले असते कारण तो प्रकाशाचा पांथस्थ झालेला असतो. अर्थात तो अंधार आहे ही व्याख्याही आता त्याच्या चित्तात उमटत नसते ! कारण ईश्‍वरप्रेमातच तो क्षणाक्षणाला उगवत राहतो. असे अंतरीचे रसार्जन दिव्य आहे.
    श्रीकृष्णार्पणमस्तु !
लेखकु - दामोदर प्र. रामदासी

मय्यर्पित मनोबुद्धि : समर्पणकी कसोटी और कर्मसंन्यास (हिंदी)

मय्यर्पित मनोबुद्धि :
समर्पणकी कसोटी और कर्मसंन्यास (हिंदी)

    आत्मदानकी दिव्यता याने समर्पण भाव। समर्पण याने भगवंत के प्रति सर्वोच्च अविचल स्थिती। समृद्ध प्रगतियान।
    यतोऽअभ्युदय नि:श्रेयस सिद्धी स धर्म:॥ अभ्युदय अर्थात प्रापंचिक एवं नि:श्रेयस अर्थात पारमार्थिक सर्वोच्च लब्धता याने धर्म पर इस पुरुषार्थ के लिए चाहिए संपूर्ण समर्पण कि चित्तस्थिती। समर्पण कि भावना जीवन को लक्ष्य बनाती है और लक्ष्य एवं लक्षवेधी दोनों को ही दिव्यता प्रदान कराती है। यही है भगवंत के प्रति भागवत आत्मनिवेदन या अव्यभिचारी प्रेम ! वेद जिसे यज्ञ कहते है, उसे अध्यात्म में भक्ति कहते है। समर्पण शब्द यह सर्व भावयुक्त है। अर्थात यज्ञ प्रवृत्ती में अभिलाषा होती है, यह विचार अलाहिदा ! जो भक्ति में या समर्पण में नहि होता।
    मय्यर्पित मनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥गीता 8.7॥- अर्थात मुझे मन एवं बुद्धी अर्पण करो, ऐसा तु मुझेही प्राप्त हो जाएगा, इस में संशय नहि।
    संशय मत रख इन शब्दो में भगवान प्रतिज्ञतापूर्वक यह बात कह रहे है यह सुनिश्‍चित हो जाता है।
    प्रतिज्ञतापूर्वक यह शब्द सृष्टीका सनातन नियम है, यह शब्द अंतिम सिद्धांतरुप है। इस कारण इस समर्पण होनेवाले की भावदशा को अपनेआप महत्त्व प्राप्त हो जाता है।
    यत्करोषि यदश्‍नाचि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥ गीता 9.27॥ अर्थात होनेवाली प्रत्येक क्रिया में ईश्‍वरार्थ धारणा रखना यह समर्पण का प्रथम पाठ है। कारण जिसके प्रति समर्पित होना है, वह पदार्थ भी व्यापक एवं पूर्ण चाहिए। आधेअधुरे पदार्थों के प्रति समर्पित होना याने वैसे ही गुण समर्पित होनेवाले चित्त में प्रकट हो जाएंगे यह बात गौर करने लायक है।
    इस कारण समर्पित होते समय चित्त किस दशा मे चाहिए ? 1) भगवान ने मुझे उसे जैसा चाहिए वैसाही बनाया हुआ है, और उतनाही मुझे दिया है। 2) जो दिया है वह उसके लिए और मेरी सामर्थ्य देखकर मुझे दिया है। वह दिया हुआ कितना चाहिए यह तय करने का अधिकार मुझे नहि है और वैसी वासना भी मुझे नहि रखनी चाहिए । और दिया हुआ मुझे उसके लिएही उपयोग करना है। 3) जैसे फुलो में सुगंध, वायु में बहने का गुण उसने दिया है, तब फुलने वायु होने की अपेक्षा रखना या वायु ने फुल होने का हट करना गलत है और भगवान के इच्छाप्रति अप्रसन्न होने जैसा है। ऐसी चित्त कि स्थिती में समर्पण का पतन हुआ है ऐसा समझना उचित होगा। उसने दि हुई सामर्थ्य से उसके प्रति समर्पित होना ही प्रसन्नता का रहस्य है।
    4) अपने प्रति अज्ञान का या कमदर्जे का भाव या अपराधवृत्तीकी ग्रंथी यह पारमार्थिक गुनाह है। कर्मवृत्तिका त्याग या निवृत्ती यह ढोंग हो जाता है कारण वैसी कृती अर्थात भगवान ने जो मेरे लिए कार्य बनाया है उसके प्रति नाखुष होने जैसा है। और उन कर्मों के माध्यम से भगवान को मेरा समर्पण का भाव चाहिए था उस भाव को जैसे मै ही उखाड के फेंक रहा हूँ । इस कारण जो कर्म मुझसे हो रहे है वह मेरे माध्यम से वह कर रहा है और उसे ही समर्पित हो रहे है ऐसी भावदशा ईशपूजा है। 5) इस कारण उन सारे कर्मों के प्रति अखंड प्रसन्नभाव और उत्साह अगर चित्त में चोबीसो घंटे है तो भगवान मुझ पर खुष है ऐसा समझना चाहिए।         बाह्य कर्मों के साथ मन (संकल्प एवं भोग), चित्त (आस्था), बुद्धी (स्मृति एवं गति) और अहंकार (अभिमान एवं अस्मिता) यह सारी अंतरीय शक्तियाँ ईश्‍वरार्थ उपयोग में लाना यह बात स्वाभाविक हो जाती है।
    चित्त मे समाधान के साथ, अनंत ने मुझे जैसा रखा है मैं वैसा ही रहुँगा - संत तुकाराम कि इस वाणी में रखने कि संकल्पना कि गहनता चिंतनीय हो जाती है।
    संसार कि इस क्रिडा में सोंपा गया काम औरों की सहायता से यथासंभव करना पडता है, ऐसे में किसी खिलाडी ने अगर उस कार्य को टाल दिया तो उस क्रिडा का आनंद समाप्त हो जाता है। ऐसे खिलाडी को आनंद भी चाहिए पर कार्य के बीना। ऐसे खिलाडी खेल को बिगाड देते है या उस खेल से अलग हो जाते है। ऐसे जीवों को तथाकथित कर्मसंन्यासी कहते है। इनको आनंद कि तो वासना है पर खेल नहि चाहिए। एक प्रकारसे भगवाननिर्मित क्रिडा में यह तो अपराधी सिद्ध हो जाता है। क्योंकी उसने उस खेल को ही झुटा समझा है।
    संत ज्ञानेश्‍वर (भक्तों कि मां) गीतापर टीका करते समय, जब तक देह है तबतक कर्मत्याग अशक्य आहे यह बात पुरे जोरसे कहते है- और इन पांच कारणों से कर्म घटीत होता है ऐसे कहते है- देह, कर्ताजीव, विभिन्नइंद्रिये, कर्तृत्वशक्ति और दैव-देवोंका समुदाय। कर्मसंन्यास वही है जिस में अहंकार रहित ईश्‍वरार्पण या सद्गुरुर्पणका भाव है।
    अहं-बुद्धि-चित्त के प्रति नकारात्मक भाव छोडकर उन्हे ईश्‍वर के प्रती जुडाकर रखना और जो जो मेरे कार्य है उन्हे उस ईश्‍वरप्रति समर्पण करना यह भाव ही कर्मसंन्यास है।
    स्वामी विवेकानंद कहते है यह संसार याने शाला का बडा मैदान है। और हम उस शाला में जानेवाले बच्चों को उसपर खेलने के लिए छोडा गया है। ऐसी बुद्धी आनेपर फिर इस जगत में हसने के या खिलाडुवृत्ती के अलावा क्या हात में रह जाता है। ऐसे में हमारे माध्यम से खेलने वाला भी वह और खेल भी वह । इस कारण पकडने लायक क्या रह जाता है ? इस खेल को हि संत ज्ञानेश्‍वर चिद्विलास कहते है।
    भोगविषयों के प्रति आसक्ति कि भावनांओं को अपेक्षा प्रेम कि भावना महत्त्वपूर्ण है । भोग भी वही है। अहं भावनांओं के प्रति अपराधभाव पकडने कि अपेक्षा उसे व्यापक स्वरुप देना उचित है। लोभ भी उसका, दंभ भी वही, मोह में मोहन ही वही। ऐसी स्थिती में षड्विकारों के प्रति यह विकार है ऐसी भावना जाकर षडभावयुक्त ऐसा मै वहि हूँ ऐसा व्यापक भाव उतर आता है। इस धारणा के कारण आत्मगंडयुक्त चित्त कि विपन्नावस्था समाप्त होती है। ईश्‍वरीय प्रेम कि अद्वितीय भावना ही ऋजुता है ! वह प्रकट हो जाती है। उस व्यापक अहंता में उस भगवंत के अवतरण हो जाते है।
    भक्तिगंगा किनारे आया हुआ शरणागत उपासक सद्गुरु के सामने उस गंगा के प्रवाह के साथ अपने आपको बहा देता है। इस समर्पण को बुद्ध स्रोतापन्न होना कहते है। अर्थात यह समुद्र की आकांक्षा के लिए नहि है वरन् वह बहना हि लक्ष है। पहुँचने के लिए यह बहना नहि होता ।
    शरणागत भाव के मंदिर का शिखर याने समर्पण भाव ! अर्थात उसमे समत्व भावना के साथ अर्पण होना उस भाव के अंतर्निहित है। अब सुखदु:ख कि भावनाओं का आवाहन उपासक भगवंत के प्रति समर्पित करता रहता है। कारण योगभ्रष्टताकी आत्मपीडा उसे मिटानी होती है। उसकी यह भोगभावनाओं के प्रति उपेक्षा में शुष्कता नहि होती वरन् समर्पित भाव होने के कारण वह उत्साहमय होता है। इस किनारे पर भोगमय अभ्युदय का सुख उत्सव मनाने के बाद आया हुआ वह वीतराग होता है। उसे उस किनारे का अकारण आनंदउत्सव का वैकुंठ बुला रहा है। उसे उस भोगविषय के प्रति आसक्ती भी नहि होती और क्रोधही भी नहि आता, इसेहि कृष्ण अनासक्त योग कहते है।
    अब उपासकका अंधेरे के साथ झगडा समाप्त हो चुका है, कारण अब वह प्रकाश पथ का पांथस्थ बन चुका है। अर्थात वह अंधेरा है ऐसी व्याख्या भी उसके चित्त में प्रकट नहि होती ! कारण ईश्‍वरप्रेम मे हि क्षणक्षण वह उगता रहता है। ऐसा यह भीतर का रसार्जन दिव्य है।
गुमशुदि से अब तो पाला पड गया है इश्क का।
रहनुमा गुमराह दोनों की खतम है राह अब॥रहिमन॥
    श्रीकृष्णार्पणमस्तु !
लेखक - दामोदर प्र. रामदासी