Thursday, May 4, 2017

नाडीशोधन प्राणायामका महत्त्व - आदी शंकराचार्यका दृष्टिकोण

नाडीशोधन प्राणायामका महत्त्व - आदी शंकराचार्यका दृष्टिकोण

श्‍वेताश्‍वेतरोपनिषद के अध्याय 2, मंत्र क्रमांक 8 में ऋषी कहते है-
त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं
हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिवेश्य।
ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान
स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि॥8॥

(सिर, ग्रीवा और वक्षस्थल) तिनोंको उँचे रखते हुए शरीरको सीधा रख मनके द्वारा इन्द्रियोंको हृदयमें सन्निविष्ट कर विद्वान ओंकाररुप नौकाके द्वारा संपूर्ण भयानक जलप्रवाहोंको पार कर जाता है॥8॥
    आदी शंकराचार्य इस विधी पर भाष्य करते हुए बतलाते है की प्राणायाम के द्वारा जिसके मनकी अशुद्धी क्षीण हो जाती है उसीका चित्त ब्रह्ममें स्थिर होता है, इसलिए प्राणायामका वर्णन किया जाता है। पहले नाडीशोधन करना चाहिए। उसके पिछे प्राणायाममें अधिकार होता है। नाडीशोधन या अनुलोमविलोम प्राणायम का पुरा विधी बतलाते हुए परिणाम बतलाते है- त्रि: पञ्चकृत्वो वा एवम् अभ्यस्यत: सवनचतुष्टयमपरात्रे मध्याह्ने पूर्वरात्रेऽर्धरात्रे च पक्षान्मासाद्विशुद्धिर्भवति। - यह प्राणायाम शेषरात्री, मध्याह्न, पूर्वरात्रि और अर्धरात्र इन चार समय तीन तीन या पाँच पाँच बार अभ्यास करनेवालेकी एक पक्ष या एक मासमें नाडी शुद्धि हो जाती है।
    अतिभोजन या अभोजन का त्यागकर, पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर शास्त्रोक्त विधीसे नाडीशोधन करे। जो योगी नाडीशोधन किये बिना अभ्यास करता है उसका श्रम व्यर्थ होता है। गुरुकी बतलाई हुई विधी को एकांत में तीन चार वर्ष या तीन चार मासतक अभ्यास करे। प्रात:काल, मध्यान्ह तथा सायंकालमें स्नान कर सन्ध्यादि कर्मोंसे निवृत्त हो छ:-छ: प्राणायाम करे। शरीरका हलकापन, कान्ति, जठराग्निकी वृद्धि, नादका सुनायी देना ये सब नाडी शुद्धिकी सूचना देनेवाले चिह्न है।
    नाडियोंकी शुद्धि जप करनेसे नही होती- शुध्यन्ति न जपस्तेन, अत: वह नाडीशुद्धिका हेतु नहि है। इसके पश्‍चात रेचक, पूरक और कुंभक क्रमसे प्राणायाम करे। प्राण और अपानका संयोग होना ही प्राणायाम कहलाता है। हे गार्गी !- प्रणव त्रिरुप है। ये जो रेचक, पूरक, कुंभक है इन्हे प्रणव ही समझो। फिर आचार्य प्रणवका स्वरुप, प्राण का महत्त्व समझाते है। आचार्य अंतमे बतलाते है- साधक को चाहिए कि प्राणायामद्वारा शारीरिक दोषोंको भस्म करे, धारणासे पापोंका नाश करे, प्रत्याहारसे वैषयिक संसर्गोंका अंत करे और ध्यानसे अनीश्‍वर गुणोंकी निवृत्ति करे। जो पुरुष प्रतिदिन स्नान करके सौ प्राणायाम करता है वह यदि माता पिता या गुरुका हत्यारा हो तो भी तीन वर्षमें उस पापसे मुक्त हो जाता है। अगले मंत्र में कहा गया है कि साधक को चाहिए युक्त आहार-विहार करता हुआ प्राणोंका निरोधकर जब प्राणशक्ति (प्राणधारणाका सामर्थ्य) क्षीण हो जाय तब नासिकारंध्रद्वारा उसे बाहर निकाल दे। और फिर  वह विद्वान पुरुष दुष्ट अश्‍वसे युक्त रथके सारथिके समान सावधान होकर मनका नियंत्रण करे। आगे योग की सिद्धी बतला कर योगी कि स्थिती परमात्ममय बतलाते है।

Saturday, November 26, 2016

संत ज्ञानेश्‍वरांची संजीवन समाधि अवस्था (मराठी)

संत ज्ञानेश्‍वरांची संजीवन समाधि अवस्था
    शरीराच्या माध्यमातून करत असलेल्या लीलेला थांबवून आता त्या चौकटीच्या बाहेर पडून माऊलींना उपासकांना धर्मज्ञान प्रदान करायचे कार्य चालु ठेवायचे होते. संजीवन समाधीचा माऊलींचा हा निर्णय पाहिल्यावर ‘आय एम अ व्हाईस विथाऊट फॉर्म’ हे स्वामी विवेकानंदांचे वाक्य आठवते. कार्य करायला जेव्हा शरीराच्या मर्यादा जाणवू लागतात तेव्हा माऊलीला संजीवन समाधीचा निर्णय घ्यावा लागला. जो जन्मतही नाही व मृत्युही पावत नाही अशा अनंत चैतन्याला शरीराचे व्यवधान वाटणे स्वाभाविक आहे. त्यांनी दिवस निवडला, तो निर्णय आपले सद्गुरु संत निवृत्तीनाथांना सांगितला. संत नामदेवांसकट अनेक संत गोळा झाले. तिनचार दिवस आधीच नामदेवांच्या पुत्रांनी समाधीस्थान तयार केले. कार्तिकी द्वादशीला शेवटचे कीर्तन माऊलींनी केले, सामान्यजनांचा निरोप घेतला. सामान्यजनांचं हृदय अर्थात भरुन आलं. पण जे युक्ती जाणत होते ते स्थिर होते. कीर्तनानंतर माऊलींनी मौन धारण केले. कार्तिकी वद्य त्रयोदशीला सिद्धबेटाचा परिसर टाळमृदंगानी व विठ्ठल नामाने भारुन गेला. सिद्धेश्‍वर शिवमंदिराजवळील गुहेत उन्मनी अवस्थेतील ज्ञानदेवांना नामदेव व निवृत्तीनाथांनी आधार देऊन आसनावर नेऊन बसवले. भगवान विठ्ठल साक्षीला होते. माऊलींच्या इच्छेने ज्ञानेश्‍वरी पुढ्यात ठेवली. दीर्घ ओंकारानंतर सद्गुरुंच्या समोर त्यांना गहन समाधी लागली. त्या गुहेचे द्वार स्वहस्ते निवृत्तीनाथांनी बंद केले. ही संजीवन समाधी म्हणजे नेमके काय हे काही संशोधनाच्या आधारे समजुन घेण्याचा आपण प्रयत्न करु. या विषयावर लिहिण्याचा आपला अधिकार नाही पण या निमित्ताने माऊलींचे स्मरण करण्याची संधी आपण का दवडावी ! म्हणुन हा लेख.
    कुंडलिनी उपासनेत तिच्या त्रिविध अवस्था ब्रह्मग्रंथी, विष्णुग्रंथी व रुद्रगंथी यांचे वर्णन आहे ; या ग्रंथी म्हणजे वैदिक कल्पनेप्रमाणे स्वर्ग, मृत्यु व पाताळ या त्रिलोकांची द्वारे होत. येथे स्वर्ग म्हणजेच ‘मोक्ष’ होय. मोक्ष, स्वसंवेद्य, अवधूत, सिद्धत्त्व हे सर्व शब्द अवस्थेने एकाच अर्थाचे आहेत. येथील मोक्ष म्हणजेच ‘चिरंजीवपद’ वा ‘संजीवन समाधि’ अवस्था होय.
    ब्रह्मग्रंथि मणिपूरचक्रात मध्यभागी असून हिचा भेद झाल्यावरच ऊर्ध्वगती वा उन्नत स्तरीय दिव्यसृष्टींत प्रवेश मिळू शकतो. विष्णुग्रंथि हृच्चक्रात (हृदयचक्रात) असून रुद्रग्रंथि आज्ञाचक्राच्या व सहस्राधाराच्या बरोबर मध्यभागी असते.
    मग कुंडलिनियेचा टेंभा। आधारी केला उभा। तया चोजवले प्रभा। निमथावरी ॥ओवी क्र. 51, अ. 12॥- कुंडलिनी आधारचक्रपासून मणिपूरचक्रापर्यंत पूर्ण जागृत आहे. ती हळूहळू सुषुम्नामार्गे आपल्या प्रगत शक्तिकेंद्रांशी युक्त व्हावयास ऊर्ध्व मार्गाने प्रयाण करणार आहे. अर्थात हा पिंड ब्रह्मांडाची चेतना शक्ति म्हणजे कुंडलीनीचा प्रवास माऊली सांगते. ती शिवाची निजकला अभेदपणे पिंडब्रह्माचा पसारा क्रियाद्युक्त करत असते. ज्ञानेशांच्या नाथपरंपरेचा हाच शिवशक्ती ऐक्य प्रबोध होय. ऋग्वेदांत हिला कुहरिणी, कुवरणी इ. नावे आहेत. देहात ब्रह्मरंध्र शिव सहस्रधारांत शिवता शक्ति रुपाने प्रकटल्यावर गतीने तिचा अध:संचार सुरु होतो हेच सृजनकार्य होय. ती शक्ति नाभीस्थानांत प्रवेशल्यावरच संवेद्य होऊन तिच्यात खरे कल्याणकारी धर्मज्ञान संचरित होते. असो. सुषुम्नेची जी स्वयंभू, बाण व पाताळ अशी तीन द्वारे आहेत ती ब्रह्मा, विष्णु व रुद्र या तीन देवतांशी संबंधीत आहेत. यांनांच ग्रंथी ही संज्ञा आहे. ज्यांचे वर्णन सुरुवातीला बघितले.
    संजीवनसमाधी म्हणजे जिवंतपणी पुरुन घेणे वा जिवंत समाधी नव्हे. जीवंत वा मृत समाधी यांना योगांत स्थान नाही. असलेच तर थडगे वा पदस्थापना या अर्थाने आहे.
    समाधीत जिवंत असणे हाच संजीवन समाधीचा - निर्वाणसमाधीचा बोध होय. न संपणारी निरुत्थान समाधी वा अक्षय निर्वाण समाधी म्हणजेच संजिवन समाधी होय. विश्‍वसामरस्य साधलेले ईश्‍वरस्वरुप जेव्हा दृश्य टाकून लीन होते तेव्हा नाहिसे होत नाही तर कार्यार्थ अनेकांतून संचार करत असते. यौगिक सामर्थ्याने पंचमहाभूतांत विलीन केलेले शरीर गरज वाटली तर परत पंचभौतिक तत्त्वांना धारण करुन माऊली शरीर धारणा करु शकते. अर्थात लेकराचा आत्यंतिक शरणागत भाव व विरह बघुन माऊली आपल्या लेकरासाठी असं करुही शकते, असा भाव धारण केलेले वारकरी उपासक अजानवृक्षातळी ज्ञज्ञज्ञानेश्‍वरी चिंतनात मग्न राहतात. योग्य उपासकाला ओेंकार अनुभव देऊन आपल्या उपस्थितीचा स्पर्श माऊली देतात. संजीवन समाधी सोहळ्याच्या पावन सोहळा निमित्ताने माऊलींचे स्मरण करुन दृश्य वा अदृश्य रुपात त्यांनी आपल्यावर कृपेचा मेघ वर्षित करावा ही प्रार्थना आपण करुयात. आहे. जय रामकृष्णहरी !
लेखन- दामोदर प्र. रामदासी

संत ज्ञानेश्‍वर की संजीवन समाधि अवस्था (हिंदी)

संत ज्ञानेश्‍वर की संजीवन समाधि अवस्था
    पुणे के पास श्रीक्षेत्र आलंदी में सिद्धेवर शिवमंदिर के समीप संतश्रेष्ठ ज्ञानेश्‍वर महाराजने भगवान विठ्ठल और संत नामदेव जैसे संतों के समक्ष गुफा में प्रवेश कर यौगीक क्रिया से संजीवन समाधी ली। शरीर के माध्यमसे होनेवाली लीला को विराम देकर उस चौखट के बाहर आकर संत ज्ञानदेव को जगतको धर्मज्ञान प्रदान करने की इच्छा थी। उनके संजीवन समाधीके निर्णय को देखकर ‘"आय एम अ व्हाईस विथाऊट फॉर्म’'' इस स्वामी विवेकानंदजी के उद्धर्णोंका स्मरण आता है। जिसका जन्म नही, मृत्यु नही ऐसे अनंत चैतन्य को शरीर की मर्यादाओंकी अडचण निर्माण होना स्वाभाविक है। ज्ञानदेव ने दिन निश्‍चित किया। उस निर्णय को सद्गुरु संत निवृत्तीनाथ को बताया। फिर संत नामदेव से लेकर अनेक संत जमा हुए। तिनचार दिन पहले ही नामदेव के पुत्रोने समाधीस्थान तयार किया। कार्तिक द्वादशीको अंतिम कीर्तन उन्होने किया और सामान्यजन को अंतिम नमस्कार किया। ऐसे समय सामान्यजन हृदय भावनाओंसे भर आना स्वाभाविक था।  पर जो इस युक्ती को जानते थे वे स्थिर थे। कीर्तन के नंतर ज्ञानदेवने मौन धारण किया। कार्तिक वद्य त्रयोदशीको सिद्धबेट का प्रांगण करतालमृदंग ध्वनी और विठ्ठल नाम से स्पंदनशील हुआ था। सिद्धेश्‍वर शिवमंदिरा के समीप गुफा में उन्मनी अवस्था में गए ज्ञानदेव को नामदेव और निवृत्तीनाथ ने आधार देकर आसनावर बिठाया । भगवान विठ्ठल साथ थे। ज्ञानदेव की इच्छासे ज्ञानेश्‍वरी सामने रखी गयी। दीर्घ ओंकार के बाद सद्गुरु के समक्ष वे गहन समाधी में चले गए। गुफा का प्रवेशद्वार बडी शिला लगाकर उनके बडे भाई एवं सद्गुरु संत निवृत्तीनाथ ने स्वयम बंद कर दिया।
     यौगिक क्रिया एवं संजीवन समाधी की इस जटील क्रिया को इस छोटे से लेख के माध्यम से हम जानने का प्रयास करे। इस विषय पर कुछ लिखने का अधिकार तो हमे नही है अपितु इस बहाने उस महान योगी का स्मरण करने का बहाना भी हमे छोडना नही चाहिए। इसी कारण से यह साहस कुछ संशोधन के आधारपर कर रहा हूँ।
    कुंडलिनी उपासना में त्रिविध अवस्था ब्रह्मग्रंथी, विष्णुग्रंथी एवं रुद्रगंथी इनका वर्णन है। यह ग्रंथीयाँ याने वैदिक कल्पनानुसार स्वर्ग, मृत्यु एवं पाताल इन त्रिलोकों के द्वार है। यहा स्वर्ग का अर्थ है ‘मोक्ष’ । मोक्ष, स्वसंवेद्य, अवधूत, सिद्धत्त्व यह सारे शब्द एकही अवस्था के अर्थ है। यहाँ मोक्ष याने ‘चिरंजीवपद’ या ‘संजीवन समाधि’ अवस्था है।
    ब्रह्मग्रंथि मणिपूरचक्र के बीच में होती है, उसका भेद होने से ही ऊर्ध्वगती या उन्नत स्तरीय दिव्यसृष्टी में प्रवेश प्राप्त हो सकता है। विष्णुग्रंथि हृच्चक्र में (हृदयचक्र में) होती है और रुद्रग्रंथि आज्ञाचक्र के या सहस्राधाराके ठीक मध्यभाग में होती है। पिंड ब्रह्मांड की चेतना शक्ति याने कुंडलीनी की यात्रा महावैष्णव संत ज्ञानेश्‍वर माऊली बता रहे है वे कहते है- मग कुंडलिनियेचा टेंभा। आधारी केला उभा। तया चोजवले प्रभा। निमथावरी ॥ओवी क्र. 51, अ. 12॥- अर्थात कुंडलिनी आधारचक्र से मणिपूरचक्र तक पूर्ण जागृत हो जाती है। वह धीरेधीरे सुषुम्नामार्ग से अपनी प्रगत शक्तिकेंद्र से युक्त होने के लिए ऊर्ध्व मार्ग से प्रयान करती है।
    वह शिव की निजकला अभेदरुपसे पिंडब्रह्म का विस्तार क्रियाद्युक्त करती रहती है। संत ज्ञानदेव के नाथपरंपराका यही शिवशक्ती ऐक्य प्रबोध है। ऋग्वेद में कुंडलिनीके कुहरिणी, कुवरणी आदी नाम है। देह में ब्रह्मरंध्र शिव सहस्रधारां में शिवता शक्ति रुप से प्रकट होने पर गती धारण कर उसका अध:संचार शुरु हो जाता है, इसीको उसका सृजनकार्य कहते है। उस शक्तीका नाभीस्थान में प्रवेश होनेपरही वह संवेद्य होकर उस में सत्यरुपसे कल्याणकारी धर्मज्ञान संचरित होता है। सुषुम्नाकी स्वयंभू, बाण एवं पाताल यह जो तीन द्वार है वह ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र इन तीनो देवतांओंसे संबंधीत है। इनकोही ग्रंथी यह संज्ञा है। जिसका वर्णन हमने अभी देखा।
    इस समाधी में जीवीत होते हुए स्वयं को दफन कर लेना ऐसा अर्थ गलत है। इस प्रकारकी जीवीत या मृत समाधी इनको योग में कोई स्थान नाही और अगर है तो कब्र या पदस्थापना इस अर्थसे है।
    समाधी मे योगी का जिवीत रहना यह संजीवन समाधीका या निर्वाणसमाधीका बोध होता है। कभी समाप्त न होनेवाली निरुत्थान समाधी या अक्षय निर्वाण समाधी याने संजिवन समाधी । उस स्वर्ग को याने मोक्ष को उपलब्ध हुआ और उससे विश्‍वसामरस्य सधा हुआ ईश्‍वरस्वरुप योगी जब दृश्य का त्याग कर लीन होता है तब वह नष्ट नही होता अपितु कार्यार्थ अनेको में संचार करता रहता है।
    यौगिक सामर्थ्य से पंचमहाभूतो में विलीन किया हुआ शरीर जरुरत पडनेपर फिरसे पंचभौतिक तत्त्वोंको धारण कर सकता है। उपासक जो अनंत करुणामयी ज्ञानदेव का बेटा है उसका आत्यंतिक शरणागत भाव एवं विरह को देखकर माऊली याने माँ अपने बेटे केलिए ऐसा कर सकती है, ऐसी श्रद्धा चित्त मे धारण कर कितने सारे वारकरी आलंदी में समाधी मंदिर के पास अजानवृक्ष के निचे बैठकर ज्ञानदेवी का चिंतन करते रहते है। योग्य उपासकों को समय आनेपर ओंकार का अनुभव देकर अपनी उपस्थिती का स्पर्श माँ कराती रहती है।
    इस पावन अवसर पर आए हम सब मीलकर उस सद्गुरु तत्त्वका स्मरण करे, उनका आवाहन करे और हमारी आगे की यात्रा के लिए वह हमे दृश्य या अदृश्य रुपसे मार्गदर्शन करते रहे इसी शुभेच्छासे यहाँ विश्राम लेता हूंँ। जय रामकृष्णहरी !
लेखन और संशोधन- दामोदर प्र. रामदासी

Saturday, October 29, 2016

भगवान महावीर निर्वाण दिन (आश्‍विन अमावास्या) (मराठी)

भगवान महावीर निर्वाण दिन (आश्‍विन अमावास्या)
    भारतात निर्माण झालेल्या आध्यात्मिक विचाराला सनातन धर्म वा हिंदू धर्म म्हटले जाते. वैदिक, बौद्ध, जैन, सिख असे अनेक पंथ उपपंथीयांनी या आध्यात्मिक विचाराला समृद्ध केले. दु:खातून मुक्ति वा निर्वाणासाठी अनेक विधी दिले. यात विशेष क्रांतीकारक चेतना अवतरीत झाल्या ज्यांनी या अध्यात्मगंगेला लोकहृदयात त्या त्या काळातील भाषेत प्रतिष्ठीत केले. अशांपैकी एक महान चेतना म्हणजे भगवान महावीर !
    कोण्या एका काळात एका पित्याचे दोन पुत्र, त्यातला एक राष्ट्ररक्षणासाठी हत्यार चालवणारा क्षत्रिय होत असे व दुसरा वेदमंत्र जाणणारा ब्राह्मण. तसेच दु:खमुक्त करणारे विधी व पंथ (मार्ग) वेगवेगळे होते पण व्यक्तिला त्याचे अंतीम सत्य दाखवणारा, सनातनत्वाचे भान देणारा, पुनर्जन्म-पूर्वजन्म सिद्धांत मानणारा, उपासनेत ओंकाराची अनुभूति येणारा, कर्म सिद्धांत स्वीकारणारा म्हणून एकच सनातन धर्म होता. सनपूर्व 15 व्या शतकात कुरुपांचालांच्या भूमीत ब्राह्मण, क्षत्रिय भेद पडला.
    भगवान श्रीकृष्णांचे (जे जैनांच्या पुढच्या कल्पात पहिले तीर्थंकर असतील) चुलतभाऊ घोर अंगिरस (यदुकुळातील श्रेष्ठ पुरुष दशार्ह-अग्रज समुद्रविजय यांची राणी शिवादेवी यांच्या पोटी श्रावण शुक्ल पंचमीला जन्म) ज्यांनी मुक्तिसाठी अहिंसावादी जैन पंथ स्वीकारला व केवलज्ञान प्राप्त करुन भगवान नेमीनाथ या नावाने 22 वे तीर्थंकर म्हणून प्रसिद्ध झाले. त्यांच्या निमित्ताने यादवकुळात ब्राह्मण व श्रमण परंपरेचा मेळ साधला गेला असं म्हटलं तर वावगं ठरु नये. त्यांच्या नंतर जैन परंपरेत पुढे सनपूर्व 599-527 दरम्यान 24 वे तीर्थंकर म्हणून भगवान वर्धमान महावीर झाले. ज्यांची अश्‍विन आमावस्या ही तिथी (दिवाळीचा लक्ष्मीपुजनाचा दिवस) निर्वाण दिन म्हणुन ओळखली जाते.
    बिहार राज्यातील वैशालीच्या जवळील कुंडग्रामी (वसाढ) क्षत्रिय कुळातील पिता सिद्धार्थ व माता त्रिशला यांच्या पोटी चैत्र शुद्ध त्रयोदशीला जन्म झाला. वैशाली हे मोठे गणराज्य होते. मगध, कोसल, वत्स व अवंती या विशाल गणराज्याच्या बरोबरीने त्याचा उल्लेख होतो. आईवडिलांनी वर्धमान नाव ठेवले तरी वीरवृत्तीमुळे ते महावीर म्हणून प्रसिद्ध पावले. इंद्र त्यांच्या दर्शनाला आला होता त्याने त्यांचे दर्शन घेताच त्यांना वीर असे संबोधले. तर चारणमुनींनी सन्मती असे संबोधले. संगमदेवाने त्यांना महावीर असे नाव ठेवले.  ज्ञातृपुत्र असेही एक नाव त्यांना आहे.
    वयाच्या तिसाव्या वर्षी त्यांनी गृहत्याग केला. ऋजुकूला नदीच्या किनारी जृंभक गावी बारा वर्षे कठोर तप करुन केवल ज्ञान त्यांना मिळाले. नंतर 66 दिवस मगध देशातल्या राजगृहाजवळ विपुलाचल पर्वतावर मौन धरुन त्यांनी विहार केला. तिथेच इंद्रभूती या ब्राह्मणाच्या शंका दूर करुन त्याला पहिला गणधर बनवले. याशिवाय त्यांचे अनेक मुख्य गणधर ब्राह्मणच होते. त्यांचा ब्राह्मणधर्माला जातीप्रथा व अनावश्यक क्रियाकांड सोडता विरोध नव्हता.
    भगवान बुद्धांच्या समकालीन असणार्‍या भगवान महावीरांनी मद्य, मांस, मदिरा, हिंसा, असत्यवचन, मध, चोरी करणं यांना टाळून पत्नीशिवाय इतर स्त्रियांना माता मानणं व आवश्यक तेवढ्या धनाचा संग्रह सांगितला.
    व्यक्तिचे श्रेष्ठत्व त्याच्या कर्मावर ठरते, जन्मावर नाही असा स्पष्टपणा त्यांच्या उपदेशात होता. क्षत्रिय कुळातला जन्म असुनही ‘मी एक श्रेष्ठ ब्राह्मण आहे’ असे ते म्हणत. अध:पतित पुरोहित व त्यांचे अनावश्यक जटिल क्रियाकांड यांना विरोध करत स्त्री, पुरुष व सर्व वर्ण यांना निर्वाणाचा समान अधिकार आहे असे ते म्हणाले.
    य: शस्त्रवृत्ति: समरे रिपु: स्याद् य: कण्टको वा निजमण्डलस्य । अस्त्राणि तत्रैव नृपा: क्षिपन्ति न दीनकानीनशुभाशयेषु॥ अर्थात जो शस्त्रधारण करुन रणांगणात युद्ध करण्यासाठी आला असेल अथवा जो आपल्या देशाला बाधक ठरत असेल अशावरच राजांनी शस्त्र उचलावे. दीन, दु:खी व सद्विचारी पुरुषांवर त्याने शस्त्र उचलु नये. याचाच अर्थ योग्य ठिकाणी वापरलेली हिंसा ही योग्यच आहे हे स्पष्ट केले.
    अर्धमागधी भाषेतील भगवतीसूत्र या ग्रंथाच्या माध्यमातून गुरुशिष्य संवादाने साधकांच्या अनेक शंका ते सोडवतात. साधनेद्वारा संकुचितता सोडून सर्वसंग्राहक पातळी कशी येते याचे प्रत्यंतर त्यांच्या अनेकांतवाद वा स्यादवाद विचारात दिसते. कुठल्याही गोष्टीचा सर्व बाजुंनी विचार करण्याचा संकेत येथे अभिप्रेत आहे. वेगळा विचार करणार्‍या प्रतिपक्षाबद्दल समंजसपणा दाखवण्याचे मानसिक धैर्य अभिप्रेत आहे. स्याद्वादाने येणारे सम्यगज्ञान व अहिंसेने येणारे सम्यगदर्शन या दोघांचा परिपाक सम्यक चारित्र्यात झाला पाहिजे, जो तो आपापल्या कर्म फळांना जबाबदार आहे म्हणून मोक्षासाठी क्रियाक्षय करावा व ज्याचा त्याने स्वत:चा उद्धार स्वत: करुन घ्यावा, कोणी परमेश्‍वर तो देणार नाही असे त्यांनी सांगितले.
    मोक्षाचे अधिकारी कोण ? अहिंसा, कर्म इ. उपदेश बघता भगवान श्रीकृष्णांच्या गीतेतील क्रांतिकारी विचारांची आठवण येते.  केवलज्ञानानंतर 42 वर्षे त्यांनी श्रमणपंथाची संघटना व प्रसाराचे कार्य केले व 72 व्या वर्षी आश्‍विन आमावस्येला मोक्षाला गेले.
    सो जयइ जस्स केवलणाणुज्जलदप्पणम्मि लोयालोयं । पुढ पदिबिंब दीसइ वियसिय सयवत्तगब्भगउरो वीरो ॥- ज्याच्या केवलज्ञानरुपी उज्ज्वल दर्पणात लोक आणि अलोक प्रतिबींबासारखे विशद रुपाने दिसतात आणि जो विकसित कमलाच्या परागाप्रमाणे सुवर्णकांतीने झळकतो, अशा भगवान महावीराचा जयजयकार असो !
लेखन व संशोधन- दामोदर प्र. रामदासी

भगवान महावीर निर्वाण दिन (आश्‍विन अमावास्या) (हिंदी)

भगवान महावीर निर्वाण दिन (आश्‍विन अमावास्या)
    भारत में निर्माण हुए आध्यात्मिक विचार को सनातन धर्म या हिंदू धर्म कहते है। वैदिक, बौद्ध, जैन, सिख ऐसे अनेक पंथ उपपंथो ने इस आध्यात्मिक विचार को समृद्ध किया। दु:ख से मुक्ति या निर्वाण के लिए अनेक विधीयाँ दि। इस कार्य के लिए विशेष क्रांतीकारक चेतना अवतरीत हुई, जिन्होने इस अध्यात्मगंगा को लोकहृदय में उस काल की भाषा में प्रतिष्ठीत किया । ऐसी चेतनाओं में एक महान चेतना हुई भगवान महावीर !
    किसी समय में एकही पिता के दो पुत्रो में से एक राष्ट्ररक्षण के लिए शस्त्र उठानेवाला क्षत्रिय होता था तो दुसरा वेदमंत्र जाननेवाला ब्राह्मण । दु:खमुक्त करनेवाली विधी एवं पंथ (मार्ग) अलगअलग होते थे पर व्यक्तिको उसका अंतीम सत्य दिखलानेवाला, सनातनत्वका स्मरण करा देनेवाला, पुनर्जन्म-पूर्वजन्म सिद्धांतको माननेवाला, उपासना में ओंकारकी अनुभूति देनेवाला, कर्म सिद्धांत स्वीकार करनेवाला एकही सनातन धर्म था। सनपूर्व 15 वी सदी में कुरुपांचाल की भूमी में ब्राह्मण, क्षत्रिय ऐसा भेद शुरु हुआ था।
    भगवान श्रीकृष्ण के (जो जैनों के अगले कल्प में पहले तीर्थंकर होंगे) चचेरेभाई घोर अंगिरस (यदुकुल के श्रेष्ठ पुरुष दशार्ह-अग्रज समुद्रविजय इनकी रानी शिवादेवी इनके गर्भसे श्रावण शुक्ल पंचमीको जन्म) जिन्होने मुक्ति के लिए अहिंसावादी जैन पंथ का स्वीकार किया और केवलज्ञान प्राप्त करके भगवान नेमीनाथ इस नाम से 22 वे तीर्थंकर होकर प्रसिद्ध हुए। इसी बहाने यदुकुल में ब्राह्मण और श्रमण परंपराका मिलन हुआ ऐसा कहना अनुचित नही होगा । उनके बाद जैन परंपरा में सनपूर्व 599-527 के बीच में 24 वे तीर्थंकर भगवान वर्धमान महावीर हुए। जिनकी अश्‍विन अमावस्या यह तिथी (दिवालीका लक्ष्मीपुजनका दिन) महानिर्वाण दिन से पहचाना जाता है।
    बिहार राज्य में वैशालीके पास कुंडग्राम में (वसाढ) क्षत्रिय कुल में पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला इनके गर्भसे चैत्र शुद्ध त्रयोदशी को इनका जन्म हुआ। वैशाली महत्त्वपूर्ण गणराज्य था। मगध, कोसल, वत्स और अवंती इन विशाल गणराज्यों के समान वह बडा था। माँबाप ने वर्धमान नाम रख दिया तो वीरवृत्ती के कारण वे महावीर कहलाए। एक बार इंद्र उनके दर्शन के लिए आया था तब दर्शन लेते ही उन्हे वीर ऐसा कहा। तो चारणमुनीने सन्मती ऐसा कहा। संगमदेवने महावीर ऐसा नाम रखा। ज्ञातृपुत्र ऐसा और एक नाम भी उनका है।
    आयु के 30 साल में उन्होने गृहत्याग किया। ऋजुकूला नदी के तट पर जृंभक गाव में बारा साल कठोर तप करके उन्हे केवल ज्ञान हुआ। बाद में 66 दिन मगध देश में राजगृह के पास विपुलाचल पर्वतपर मौन धारण कर उन्होने विहार किया। वही इंद्रभूती नाम के ब्राह्मण की शंकाओंको दूर कर उसे पहला गणधर बनाया। इसके अलावा उनके अनेक मुख्य गणधर ब्राह्मणही थे । उनका ब्राह्मणधर्मकी जातीप्रथा एवं अनावश्यक क्रियाकांड छोडकर विरोध नही था ।
    भगवान बुद्ध के समकालीन भगवान महावीर ने मद्य, मांस, मदिरा, हिंसा, असत्यवचन, शहद, चोरी करना इन बातों को त्यागकर पत्नी के सिवाय परस्त्री को माता मानना और आवश्यक धन संग्रह बताया।
    व्यक्ती श्रेष्ठ होता है उसके कर्मसे जन्म से नही ऐसी स्पष्ट बात उन्होने कही। क्षत्रिय परिवार में जन्म लेकर भी ‘मै एक श्रेष्ठ ब्राह्मण हूँ’ ऐसा वे कहते थे। अध:पतित पुरोहित और उनके अनावश्यक जटिल क्रियाकांड इनको उन्होने विरोध किया । स्त्री, पुरुष और सभी वर्णों को मुक्ती का समान अधिकार है ऐसे वे कहते थे।
    य: शस्त्रवृत्ति: समरे रिपु: स्याद् य: कण्टको वा निजमण्डलस्य । अस्त्राणि तत्रैव नृपा: क्षिपन्ति न दीनकानीनशुभाशयेषु॥ अर्थात जो शस्त्रधारण कर के युद्धभूमी में युद्ध करने के लिए आया है या जो अपनी मातृभूमी को बाधा देने वाला हो ऐसे व्यक्तीपरही राजाओं को शस्त्र उठाना चाहिए। दीन, दु:खी और सद्विचारी पुरुषों पर नही। इसका अर्थ यह हुआ की उचित समय पर हिंसा का समर्थन उन्होने किया।
    अर्धमागधी भाषा के भगवतीसूत्र इस ग्रंथ में गुरुशिष्य संवाद से साधककों की अनेक शंकाओं का वे उत्तर देते है। साधनाद्वारा संकीर्णता छोडकर सर्वसंग्राहक स्तर को प्राप्त करने का अनुभव उनके अनेकांतवाद या स्यादवाद विचारो में दिखायी देता है। किसी भी चिजका चारो दिशाओं से विचार करनेका इशारा यहा मिलता है। अलग विचारोंके विरोधी पक्ष के बारे में समझदारी दिखानेका मानसिक धैर्य यहाँ अभिप्रेत आहे। स्याद्वाद से प्राप्त होनेवाला सम्यगज्ञान और अहिंसासे मिलनेवाला सम्यगदर्शन इन दोनोंका सार सम्यक चारित्र्य में प्रतिध्वनित होना चाहिए। हर किसीपर अपने अपने कर्म फलोंकी जवाबदेही होती है, इस कारण मोक्ष के लिए क्रियाक्षय करे और हर किसी को अपना उद्धार स्वयं को ही करना होगा, कोई परमेश्‍वर मोक्ष देनेवाला नही है ऐसा उन्होने कहा।
    मोक्ष का अधिकारी कौन ? अहिंसा, कर्म आदी उपदेशों को देखते हुए भगवान श्रीकृष्ण के गीता में दिए हुए क्रांतिकारी विचारोंकी याद आ जाती है । केवलज्ञान के बाद 42 वर्ष उन्होने श्रमणपंथ संघ निर्माण और प्रसार का कार्य किया और 72 साल की आयु में उनका अश्‍विन अमावस्या को निर्वाण हुआ।
    सो जयइ जस्स केवलणाणुज्जलदप्पणम्मि लोयालोयं । पुढ पदिबिंब दीसइ वियसिय सयवत्तगब्भगउरो वीरो ॥- जिसके केवलज्ञानरुपी उज्ज्वल दर्पण में लोक और अलोक प्रतिबींबीत समान विशद रुपसे दिखायी देते है और जो विकसित कमल पुष्प परागों के समान सुवर्णकांती से तेजोमय है, ऐसे भगवान महावीर का जयजयकार हो !
लेखन एवं संशोधन- दामोदर प्र. रामदासी

Saturday, October 1, 2016

संत ज्ञानेश्‍वर ने चामुंडा देवीको अर्पित किया बली ! (हिंदी)

संत ज्ञानेश्‍वर ने चामुंडा देवीको अर्पित किया बली !

क्या हम संतोने अनुप्राणित किए हुए मार्गपर चलनेवाले साधक है ? क्या हम भागवतधर्मरुपी भगवान को समर्पित है ? क्या हरीप्रेम से हमारा हृदय विभोर हो जाता है ? क्या हम भक्तिप्रेमरुपी सद्गुरुने बतलाए मार्गपर जा रहे है ? कुलस्वामीनीकी उपासना में क्या सचमुच हमारा नवरात्र धन्य हुआ है ? अगर इसका उत्तर हा है तो दशहरे के दिन माता के नाम अर्पीत होनेवाले बलीप्रथाको हम विरोध करे। संत ज्ञानेश्‍वर बलीका सत्य अर्थ समझाते है।
प्राणशक्तिचामुंडे । प्रहारूनि संकल्पमेंढे । मनोमहिषाचेनि मुंडे । दिधली बळी ॥ ज्ञानेश्‍वरी-12-53॥
    महावैष्णव ज्ञानेश्‍वर महाराज की उपासना यात्रा में किस भैंसे की और दुंबे की बली दि जाती है ? यह समझनेका हम प्रयास करेंगे ।
    संकल्प विकल्प रुपी दुंबा एवं मनरुपी भैंसा इनको प्राणशक्ति चामुंडा देवी को बली दिया है ! ऐसे संत ज्ञानेश्‍वर बता रहे है। ज्ञानदेव का ऐसा नवरात्री का समापन विलक्षण है । यह एक आंतरिक रहस्य है जिसमे मन-चित्त की बली देने की यह यौगीक पद्धती सद्गुरुकृपाके बिना असंभव है इसी कारण से एक मर्यादित स्तर की चिंतना ही यहा प्रकट करनेका प्रयास है।
     उपासना में जो सहज ही होनेवाला है उस विलक्षण घटना में शुरु से ही मन या चित्त को जुलुम जबरदस्तीसे दबानेका कारण नाही, इस यात्रा में सुक्ष्म स्थिती में जाते समय उपासना का संवेदनशिल नाजुक प्रांत शुरु हो जाता है। मन का या चित्त का क्रियासंभव यह केवल कुंडलिनी प्राणशक्तीके तेज का ही होता है। अपेक्षित मन मौनी और चित्त चैतन्य यह सद्गुरुकृपासे सहज ही घटीत होता है।
    अपनी गुरुपरंपरा बताते हुए ज्ञानेश्‍वर कहते है की आदिनाथ याने शिव जो सारे सिद्धों के गुरु है उनका मच्छिंद्र प्रमुख शिष्य है। मच्छिंद्रनाथ ने गोरक्षनाथ को बोध दिया और गोरक्षने गहीनीनाथ को । गहीनीनाथ ने निवृत्तीनाथपर कृपा की और निवृत्तीनाथ ने अपने छोटे भाई ज्ञानदेव को सार दिया। इस परंपराको देखकर कैवल्यरुप संत ज्ञानेश्‍वर पर नाथपंथीय हठयोगका प्रभाव है यह बात स्पष्ट हो जाती है ।
    हठयोग शक्तिवादी है। इसमे शक्ति और ज्ञान निष्ठा के साथ उपासक का जीवन समर्पित होता है। ज्ञान याने शिव और कुंडलिनी याने शक्ति। यह शिवशक्तिसामरस्यान्वित उपासना हठयोग मार्ग से फलद्रुप होती है। दुसरा कोई संप्रदाय जिस को चामुंडा ऐसा संबोधित नही करता उस कुंडलिनी शक्ति या प्राणशक्ति को ‘चामुंडे’ ऐसा कहकर उस अतिप्राचीन नाथपरंपराका ज्ञानेश्‍वर गौरवता पूर्ण उल्लेख करते है।
    चामुंडा यह अज्ञ लोगोंकी देवी है। अतिवेगवान विकार वायुसे त्रस्त होने से विगलितगात्र अवस्था जिन्हे प्राप्त हुई है, बंधन में फँसे होने के कारण आधिभौतिक, आधिदैविक एवं अध्यात्मिक दु:ख का अनुभव लेनेवाले किसीभी जीव को अज्ञ कहा गया है। ऐसे अज्ञ जीवोंके सारे बंधन तोडके उनका शिवत्व से मिलन करानेवाली यह चामुंडा ‘महदंबा’ है।
    चामुंडा याने तपस्विनी कुमारिका। जिसकी उपासना करके उपासक को शिवत्व का स्मरण आता है। नवरात्री में यह समर्पणका चितशक्तिविलास अपनेआप चलता रहता है। जो प्रारंभ में प्रकृतीवशात मै अनाथ हूँ, ऐसा अनर्गल बोलता रहता है वही जीव चामुंडा की कृपा से शिवत्व का स्मरण आते ही अपनेआप नाथ हो जाता है और औरोंको भी सनाथ करने का सामर्थ्य प्राप्त करता है।
    नाथपंथी बाहरसे शिव, भीतरसे शाक्त और समाज में वैष्णव होना चाहिए ऐसाही संदेश है। उस कारण वैष्णवता उसका हृदय, शिवता यह मस्तक तो शक्तियुक्त होना ही मन होता है। स्वभावत: वह शक्तिमय, योगनिष्ठ, जनहितकारी, आचारवान होता है। इसी कारण से वह ‘नाथ’ इस संज्ञाको पात्र हो जाता है।
    प्रारंभ में मन-चित्त की क्रिया जब मलीन होती है तब ‘नाथत्व’ अप्रकट रहता है। जीवकी यह अनाथ अवस्था होती है। वहा पशुवत चेतना प्रभावी होती है।उपासना की इस सहज यात्रा में उस संवेदनशील मोडपर वह मलीनता कुंडलिनी में लीन हो जाती है। यह सहज लीनता महत्त्वपूर्ण घटना सिद्ध होती है।
    मनोदोष याने संकल्प विकल्प है, चित्तदोष याने ‘असत’ पर श्रद्धाशील होना है। यह प्राणशक्ति जागृत होते ही यह दोष नष्ट होते है। अर्थात इन दोषों को ‘अर्पण’ करना ज्ञानदेव को अपेक्षित है, इसी कारण से ज्ञानदेव के नवरात्री में देवीका ठाट असामान्य है। यहा वे ‘वीरयोगी’ लक्षणा प्रकट कर रहे है। यह वीरयोगी चामुंडा भवानी को संकल्प विकल्परुपी बली अर्पित कर शिव हो जाता है।
    उसका नवरात्र जागर सिद्ध हो जाता है, वह अज्ञान का सिमोल्लंघन करके अनंत चैतन्य के प्रांगण में विजयोत्सव मनाता है। आगे भी उत्कट उपासनारुपी पुर्णिमा को कोजाग्रती ? प्रश्‍न पुछनेवाली शक्ती ऐसे ‘जागृत हुए’ नाथ को देखकर प्रसन्न हो जाती है। ज्ञानरुपी चंद्र के शितल प्रकाश में अमृतस्य पुत्र: ! इस भावमयी दुग्धामृत का प्राशन कर वह अमर हो जाता है। संत ज्ञानेश की परंपरा ऐसे नाथ - वैष्णव के प्रवेशसे धन्य हो जाती है ! ऐसे तापहीन मार्तंड का यह मस्त नृत्य, यह आनंदगान अस्तित्व में चलता रहता है।
    भवतारिणी चामुंडा के चरणो में प्रतिक्षण समर्पित भावमयता का यह अखंड जागर हम शुरु करे और अज्ञानरुपी भैंसा उसके चरणो में बली दे। जय चामुंडा भवानी !
लेखनसेवा- दामोदर प्र. रामदासी !

संत ज्ञानेश्‍वरांनी चामुंडा देवीला अर्पण केलेला बळी ! (मराठी)

संत ज्ञानेश्‍वरांनी चामुंडा देवीला अर्पण केलेला बळी !
काय आपण संतांनी अनुप्राणित केलेल्या मार्गाने जाणारे वारकरी आहोत ? काय आपण भागवतधर्मरुपी विठ्ठलाला समर्पित आहोत ? काय हरीप्रेमानं आपलं हृदय उन्मळुन येतं ? काय आपण भक्तिप्रेमरुपी सद्गुरुंनी दाखवलेल्या मार्गाने जाणारे आहोत ? कुलस्वामीनीच्या उपासनेमध्ये काय खरोखरंच आपले नवरात्र धन्य झाले असे वाटते आहे ? याचे उत्तर हो असेल तर दसर्‍याला देवाच्या नावाने अर्पण केला जाणार्‍या बळी प्रथेला आपण विरोध करु. ज्ञानेश्‍वर माऊलींनी बळीचा खरा अर्थ समजाऊन सांगितला आहे.
प्राणशक्तिचामुंडे । प्रहारूनि संकल्पमेंढे । मनोमहिषाचेनि मुंडे । दिधली बळी ॥ ज्ञानेश्‍वरी-12-53॥
    महावैष्णव ज्ञानेश्‍वर माऊलींच्या उपासना यात्रेत कुठल्या रेड्याचा व मेंढ्याचा बळी दिला जातो ? हे पहिल्याच माळेला आपल्याला कळले तर नवरात्रीच्या जागरणाला वा उपासनेला ते पूरक ठरु शकेल.
    संकल्प विकल्प हा मेंढा व मनरुपी रेडा यांना प्राणशक्ति चामुंडा देवीस बळी दिला आहे, असे संत ज्ञानेश्‍वर सांगतात. ज्ञानदेवांचे असे नवरात्र समापन विलक्षण आहे. हे खुप आंतरिक रहस्य आहे की ज्यात मन-चित्ताची बळी देण्याची ही यौगीक पद्धती सद्गुरुकृपेशिवाय असंभव आहे म्हणुनच एका मर्यादेपर्यंतच शब्दांचा वापर करण्याचे हे धाडस आहे.
    उपासनेत जे सहजच होणार आहे त्या विलक्षण घटनेत सुरुवातीपासुनच मनाला वा चित्ताला जुलुम जबरदस्तीने दाबण्याचे कारण नाही, या वाटचालीत सुक्ष्मामध्ये उतरत असताना उपासनेचा संवेदनशिल नाजुक भाग चालु होतो. मनाचा वा चित्ताचा क्रियासंभव हा केवळ कुंडलिनी प्राणशक्तीच्या तेजाचाच असतो. अपेक्षित मन मौनी व चित्त चैतन्य हे सद्गुरुकृपेने स्वभावेच घडुन येते.
    आदिनाथ गुरु सकळ सिद्धांचा। मच्छिंद्र तयाचा मुख्य शिष्य॥1॥ मच्छिंद्राने बोध गोरक्षासी केला। गोरक्ष बोलला गहीनीप्रती। गहीनीप्रसादे निवृत्ती दातार। ज्ञानदेवा सार चोजविले॥3॥ आपल्या गुरुपरंपरेचा उल्लेख करताना कैवल्यरुप माऊलींवर नाथपंथीय हठयोगाचा प्रभाव आहे हे स्पष्टच होते.   
    हठयोग शक्तिवादी आहे. यात शक्ति व ज्ञान निष्ठेने उपासकाचे जीवन समर्पित असते. ज्ञान म्हणजे शिव व कुंडलिनी म्हणजे शक्ति. ही शिवशक्तिसामरस्यान्वित उपासना हठयोग मार्गाने जाते. दुसरा कुठलाही संप्रदाय ज्यास चामुंडा संबोधित नाही त्या कुंडलिनीला, प्राणशक्तिला ‘चामुंडे’ संबोधुन त्या अतिप्राचीन नाथपरंपरेचा माऊली गौरवाने उल्लेख करतात.
    चामुंडा ही अज्ञ लोकांची देवी आहे. विकाराच्या वार्‍याने अतिशय फडफडल्यामुळे विगलितगात्र अवस्था प्राप्त झालेल्या, बंधनात अडकलेले असल्यामुळे आधिभौतिक, आधिदैविक व अध्यात्मिक दु:खाचा अनुभव घेणार्‍या कोणाही जीवाला अज्ञ म्हटले जाते. अशा अज्ञांची समस्त बंधने तोडुन त्यांची शिवत्वाशी गाठ भेट घडवून आणणारी ही चामुंडा ‘महदंबा’ आहे.
    चामुंडा म्हणजे तपस्विनी कुमारिका. जिची उपासना करुन उपासकाला शिवत्वाचे भान येते. नवरात्रात हा समर्पणाचा चितशक्तिविलास आपोआप चालु राहतो. जो प्रारंभी प्रकृतीवशात आपण अनाथ आहोत असे बरळत असतो तोच चामुंडेच्या कृपेने व शिवत्वाच्या भानाने आपोआप नाथ होतो व इतरांना सनाथ करण्याचे सामर्थ्य मिळवतो.
    नाथपंथी बाहेर शिव, आत शाक्त व समाजात वैष्णव असावा असा संदेशच आहे. त्यामुळे वैष्णवता हे त्याचे हृदय, शिवता हे मस्तक तर शक्तियुक्त असणे हे मन होते. साहजिकच तो शक्तिमय, योगनिष्ठ, जनहितकारी, आचारवान असतोच. म्हणुनच तो ‘नाथ’ या संज्ञेला पात्र ठरतो.
    प्रारंभी मन-चित्ताच्या क्रिया जेव्हा मलिन असतात तेव्हा ‘नाथत्व’ अप्रकट असते. जीवाची हीच अनाथ अवस्था असते. तिथे पशुवत चेतना प्रभावी ठरते. उपासनेच्या सहज यात्रेत ती संवेदनशील वळणावर कुंडलिनीत लीन होते. ही सहज लीनता महत्त्वाची घटना ठरते.
    मनोदोष म्हणजे संकल्प विकल्प होत, चित्तदोष म्हणजे ‘असत’ यावर श्रद्धाशील असणे होय. ही प्राणशक्ति जागृत होताच हे दोष नाहिसे होतात. अर्थात या दोषांचे ‘अर्पण’ करणे ज्ञानेशांना अपेक्षित असल्याने माऊलींच्या नवरात्रात देवीचा थाट असामान्य आहे. इथे ते ‘वीरयोगी’ लक्षणा प्रकट करतात. हा वीरयोगी चामुंडेला असा बळी अर्पण करुन शिव होतो.
    त्याचा नवरात्र जागर सिद्ध होतो, तो अज्ञतेचे सिमोल्लंघन करुन अनंत चैतन्याच्या प्रांगणात विजयोत्सव साजरा करतो. त्या पुढेही - उपासनेच्या उत्कट पोर्णिमेला कोजागरती ? विचारत येणारी शक्ती अशा ‘जागलेल्या’ नाथाला पाहुन प्रसन्न होते. ज्ञानरुपी चंद्राच्या शितल प्रकाशात अमृतस्य पुत्र: ! या भावमयतेचे दुग्धामृत प्राशन करुन तो संजीवन झालेला असतो. ज्ञानेशांची परंपराही या नाथ - वैष्णवाच्या अशा प्रवेशाने धन्य होते ! अशा तापहीन मार्तंडांचे धुंद वारी नृत्य, हे आनंदगान अस्तित्वात चालूच राहते.
    भवतारिणी चामुंडेच्या चरणी प्रतिक्षणाला समर्पित भावमयतेचा हा अखंड जागर आपण सुरु करुयात व अज्ञानाचा रेडा तिच्या चरणी बळी देऊयात. जय चामुंडा भवानी !
लेखनसेवा- दामोदर प्र. रामदासी !