Tuesday, February 25, 2014

जैसा है वैसा दिखाई नहीं देता :

तेजगतीसे उत्पन्न भ्रांती :  
हवाई जहाज का पंखा बड़ा तीव्र गतीसे घूमता है, तो हमें संदेह होता होने लगता है की इसमे ताड़ियां है या नहीं । अंधेरे में जलती मशाल तेजी से घुमाई जाती है, लगता है कि अग्नि का गोल आकार है । पृथ्वी अपनी धूरी पर पश्च्चिम से पूर्व को घूमती है और हमें यह भ्रम होता है कि सूर्य पूर्व में उदय होता है और पश्च्चिम में अस्त होता है । मोमबत्ती जो रात को जलाई है सुबह तक एकजैसी दिखाई देती है । वास्तविकता है कि उस मोमबत्ती कि एक एक लौ प्रतिक्षण ऊपर की ओर उठती है विलीन होती है और फिर नई लौ पैदा होती है । उसीमे धसती हुई उसका स्थान लेती है । घनसंतति के कारण कायम रहनेवाले प्रकाशपूंज का भ्रम पैदा होता है । एक लौ से दूसरी लौ इतनी तेजी से निर्माण होती है की दो लौ के बीच का अंतराल दिखाई नहीं देता । क्षेत्र में भी और काल (Time) में भी वह एक के साथ एक सटी होने के कारण घनत्व कि यहाँ माया दुहरी भ्रांती पैदा करती है । तभी ट्यूब लाईट का प्रकाश भी हमें चिरकाल एक जैसा कायम रहनेवाला दिखाई देता है ।
जैसा है वैसा दिखाई नहीं देता :
पावरहाऊस में उत्पन्न होनेवाली विद्युत् शक्ति प्रतिक्षण टयूब में आकर जल करा नष्ट हो जाती है । यहाँ सचाई हमें नजारा नहीं आती । पर्टयका भासमान ठोस सत्य वास्तविक सत्य परा आवरण डाले हुए है । इसी कारण, जो जैसा है वैसा दीखता नहीं । इसी प्रकार बाह्य जगत के ये सारे ऐंद्रिय आलम्बन जिन्हे कि हम भिन्न भिन्न रंग - रूप, स्पर्श, गंध, रस आदि गुणधर्मवाले ठोस पदार्थ मानते है । वे सभी शून्य में उदय व्यय होनेवाली तरंगे मात्र है । विषयी (Subject) और विषय (Object) दोनों तरंगे ही तरंगे है, शून्यवत है । अनित्य, क्षणभंगुर है । किंतु हमें नित्य जैसा लगता है । यही माया है । लेकिन इसी माया के कारण शरीर के प्रती चिपकाव पैदा हो जाता है । जो जैसा है वह दिखाई नहीं देता । हमारा सत्य दिखाई नहीं देता । और हम अनित्यतामे, भेद में, फसे रहने के कारण सुख और दुख का अनुभव करते रहते है । पर समाधी के अभ्यास के कारण इसा भ्रांती के परे हम चले जाते है । और जो सत्य जैसा है वैसा हम देख सकते है । आदी शंकराचार्य कहते है :
      यत्र भ्रान्त्या कल्पितं तदविवेके
                तत्तन्मात्र  नैव तस्माद्विभिन्नम् ।
     भ्रांन्तेर्नाशे भाति दृषटाहितत्त्वम
               रज्जुस्तद्वद्विश्र्वमात्मस्वरूपम ॥ ३८७ ॥ विवेकचूडामणि
अर्थ : एक वस्तु में भरम होने के कारण दूसरी चीज दिखाई देती है । लेकीन विवेक के माध्यम से मूल वस्तु से वो दूसरी चीजे भिन्न नहीं है (एक ही ऊर्जा के रूप है । ) ऐसा प्रतीत होता है । दुसरी चीज को अस्तित्व नही होता (क्यूंकी दोनों एक ही है । ऊर्जा ही पदार्थ है । ) अंधेरेमे रज्जु साप जैसी दिखाई देती है लेकिन भ्रम समाप्त होते ही वह रज्जु ही है ऐसा अनुभव होता है । ये विश्र्व आत्मा या ऊर्जा ही है । लेकिन हमें भ्रम हुआ है ।
   भगवान बुद्ध कहते है : परमाणु से भी छोटा जिसे आगे विभाजीत नही किया जा सकता उसे कलाप कहते है । कलापा ठोस कण लगता है लेकिन है नहीं मात्र तरंगोंका पूंज मात्र है । जिसमे पृथ्वी धातु , अग्नि धातु , वायु धातु , जल धातु, और उनके गुणधर्म है । यही अठ्ठकलाप है । हरा कलाप में बड़ी शून्यता याने आकाश  है । वे सटे हुए नहीं है बल्कि तरंगे ही तरंगे है । यहाँ कलाप प्रतिक्षण अगणित बार उत्पन्न होकर समाप्त  होते रहते है । बीच का अंतर दिखाई नहीं देता इसलिए वस्तु ठोस दिखाई देती है । यही माया है ।
     ऐसे हमारा चित्त भी घनता प्रतीत होती है । परा यहाँ भी तरंग मात्र है । एक क्षण में सतरह बार अधिक वेगसे उत्पन्न होकर नष्ट होती है । इसको चित्तक्षण कहा है । सत्रह चित्त क्षणो का एक रूप क्षण होता है । बुद्ध कहते है
        सब्बो पज्जलितो लोको,
        सब्बो लोको पकंपितो ॥
सारे लोक प्रज्वलित ही प्रज्वलिता दिखाई देते है । समस्त लोक प्रकम्पित ही प्रकम्पित नजर आते है ।.…
           

Sunday, February 9, 2014

एक ही ऊर्जा सर्वत्र :

   धर्म के सिद्धांत कार्यरूप में परिणत नहीं किया जा सकता, तो बौद्धिक व्यायाम के अतिरिक्त उसका और कोई मूल्य नहीं । हमें अपने जीवन की सभी अवस्थाओं में उसे कार्यरूप में परिणत कर सकना चाहिए । आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन के बीच जो काल्पनिक भेद है, उसे भी मिट जाना चाहिए । क्योंकि वेदांत एक अखंड वस्तु के संबंध में उपदेश देता है । वेदांत कहता है कि एक ही प्राण सर्वत्र विद्यमान है । (आजका आधुनिक विज्ञान यही बात कहता है की सर्वत्र एक ही ऊर्जा विद्यमान है । और संसार उसकी सतत, वेगवान, प्रवाहमान, बदलनेवाली, अभिव्यक्ती है । )
    आगे हम और विज्ञानिक बाते देखेंगे । ये जानकर हमारा जीवन बदले । भविष्य के बुद्धिमान मनुष्य का यही विज्ञान और अध्यात्मिक एक ही सिक्के के दो पहलू बतलाने वाला तत्त्वज्ञान होगा ।   
     आधुनिक विज्ञान कहता है ऊर्जा और पदार्थ, अध्यात्म कहता है ब्रह्म और माया । वैज्ञानिक अपने प्रयोगोंद्वारा मॅटर का भेदन करते हुए भौतिक जगत की एकता को, सतत परिवर्तनशीलताको, अनित्यताको जान लेता है । योगी भी अपने अंतरज्ञान से यही अनुभूति करता है । वैज्ञानिक रिलेटिव्हिटी  एवं क्वांटम सिद्धांतो से यहाँ स्पष्टतया पाता है की आकाश (space), काल (Time), रूप (Matter) एवं जड़त्व (Mass) स्वतंत्र नहीं है । एक दूसरे से संबंधीत है । एक ही के अनेक रूप है । एक दूसरे से अलग नही हो सकते । योगी भी अपने समाधी से इसी एकता की अनुभूति करता है । योगी वृक्ष के जड को पकड़ता है और वैज्ञानिक वृक्ष की शाखाओं को जानता है । बाह्य जगत और अंतर्जगत एक ही है । दृश्य (Object ) और द्रषटा (Subject) एकता में परिणत हो जाते है । अद्वैत हो जाते है । योगी आकाश (space), काल (Time), कार्यकारण (Cause & Effect) इन सभी के परे चला जाता है । कर्मबंधन और संसार के परे की यहाँ अनुभूति है जो शब्दातीत, वर्णनातीत कही जा सकती है । यही है सनातन धर्मके शाश्र्वत (सनातन) सिद्धांत ।
      क्या है ये परमाणु दर्शन ? क्या है आकाश और काल ? तेजगति की भ्रान्ति क्या है ? द्वैत का भ्रम क्या है ? क्या है नटराजन्रत्य ? क्या है शून्यता या पूर्णता ? क्या है ब्रह्मनाद ओमकार ?  और एक ही सत्य की ओर जानेवाले भारत के सभी उपासना पंथ (वैदिक, बौद्ध, जैन, सिक्ख) सनातन धर्म के अंग कैसे है ?
    आगे देखेंगे। ....